ईश्वर के प्रति किया स्वाभाविक प्रेम पूर्वक भजन वह भक्ति कहा जाता है जिसमें सेवक और सेवित के बीच एक आत्मीय लगाव होता है। इस आत्मीयता को ममता कहते हैं। सेवक और सेवित के बीच एकात्मकता का भाव रहता है। यह ममता दास्य-प्रेम से ही आरंभ होती है, सेवक के द्वारा स्वामी को प्रदत्त की हुई सेवा से। इस प्रकार के संबंध के बिना प्रभु और भक्त के बीच की प्रेम लीला वास्तव में स्थापित नहीं हो पाती है। जब भक्त यह भाव करता है कि "भागवान् मेरे स्वामी हैं" और उनकी सेवा में लग जाता है, तो कृष्ण भावना जागृत हो जाती है। यह दृढ़ भाव मात्र ईश्वर के प्रेम की जानकारी से श्रेष्ठ मंच पर स्थित है।
