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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.8.71 
प्रभु कहे, “एहो हय, आगे कह आ र” ।
राय कहे, “दास्य - प्रेम - सर्व - साध्य - सार” ॥71॥
 
 
अनुवाद
सहज प्रेम की हद तक सुनकर प्रभु बोले, "यह तो ठीक है, लेकिन यदि आप और अधिक जानते हों तो कृपया मुझे बताएँ।"
 
Hearing about spontaneous love, Mahaprabhu said, “That is correct, but if you know more, please tell me.” Ramanand Rai replied, “Spontaneous dasya prema—the love exchanged between master and servant—is the highest perfection.”
तात्पर्य
रामानंद राय ने उत्तर देते हुए कहा, "सेवक भावना से किया स्वाभाविक प्रेम पूर्वक भजन ही परम पूर्णता है।

ईश्वर के प्रति किया स्वाभाविक प्रेम पूर्वक भजन वह भक्ति कहा जाता है जिसमें सेवक और सेवित के बीच एक आत्मीय लगाव होता है। इस आत्मीयता को ममता कहते हैं। सेवक और सेवित के बीच एकात्मकता का भाव रहता है। यह ममता दास्य-प्रेम से ही आरंभ होती है, सेवक के द्वारा स्वामी को प्रदत्त की हुई सेवा से। इस प्रकार के संबंध के बिना प्रभु और भक्त के बीच की प्रेम लीला वास्तव में स्थापित नहीं हो पाती है। जब भक्त यह भाव करता है कि "भागवान् मेरे स्वामी हैं" और उनकी सेवा में लग जाता है, तो कृष्ण भावना जागृत हो जाती है। यह दृढ़ भाव मात्र ईश्वर के प्रेम की जानकारी से श्रेष्ठ मंच पर स्थित है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)