कृष्ण - भक्ति - रस - भाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते ।
तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्म - कोटि - सुकृतैर्न लभ्यते ॥70॥
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अनुवाद
"कृष्णभावनामृत में शुद्ध भक्ति सैकड़ों-हजारों जन्मों के पुण्य कर्मों से भी प्राप्त नहीं की जा सकती। इसे केवल एक ही कीमत चुकाकर प्राप्त किया जा सकता है - वह है इसे प्राप्त करने के लिए तीव्र लोभ। यदि यह कहीं उपलब्ध हो, तो इसे बिना देर किए खरीद लेना चाहिए।"
"Pure devotion in Krishna consciousness cannot be attained even by the meritorious deeds of hundreds or thousands of lifetimes. It can only be obtained at a price—by an intense desire to obtain it. If it is available anywhere, it should be purchased immediately."
तात्पर्य
पिछले दो छंद पद्यवली (13, 14) में शामिल हैं, जो श्रील रूप गोस्वामी द्वारा संकलित एक एंथोलॉजी है। छंद 69 विश्वास में भक्ति सेवा को दर्शाता है, और छंद 70 तीव्र लालच से की गई भक्ति सेवा को दर्शाता है। पहली भक्ति सेवा विनियामक सिद्धांतों के अनुसार की गई है, और दूसरी ईश्वर की सहज प्रेममयी सेवा को बाहरी प्रयास के बिना दर्शाती है। इसके बाद से श्री चैतन्य महाप्रभु और रामानंद राय के बीच की बातचीत का मूल सिद्धांत भगवान के लिए सहज प्रेममयी सेवा होगी। शास्त्रों के आदेशों के अनुसार विनियामक सिद्धांत तब तक आवश्यक हैं जब तक कि किसी की मूल निष्क्रिय कृष्ण चेतना अनायास जागृत न हो जाए। सहज क्रिया का एक उदाहरण नदियों का समुद्र में बहना है। इस पानी के प्रवाह को कोई भी नहीं रोक सकता। इसी प्रकार, जब किसी की निष्क्रिय कृष्ण चेतना जागृत होती है, तो यह बिना किसी बाधा के सहज रूप से कृष्ण के चरण कमलों की ओर बहती है। सहज प्रेम पर आधारित रामानंद राय जो कुछ भी कहेंगे वह श्री चैतन्य महाप्रभु को स्वीकार्य होगा, और भगवान उनसे इस विषय के बारे में अधिक से अधिक पूछेंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥