श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 69
 
 
श्लोक  2.8.69 
नानोपचार - कृत - पूजनमार्त - बन्धोः प्रेम्णैव भ क्त - हृदयं सुख - विद्रुतं स्यात् ।
यावत्क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासा तावत्सुखाय भवतो ननु भक्ष्य - पेये ॥69॥
 
 
अनुवाद
रामानंद राय ने आगे कहा, "जब तक पेट में भूख और प्यास है, तब तक खाने-पीने की विविध वस्तुएँ मनुष्य को अत्यंत सुख देती हैं। इसी प्रकार, जब भगवान की शुद्ध प्रेमपूर्वक पूजा की जाती है, तो उस पूजा के दौरान किए गए विविध कार्य भक्त के हृदय में दिव्य आनंद जगाते हैं।"
 
Ramanand Rai continued, "As long as there is hunger and thirst in the stomach, a person experiences immense pleasure from various kinds of food and drink. Similarly, when the Lord is worshipped with pure love, the various activities performed during that worship awaken divine joy in the devotee's heart."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas