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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  2.8.66 
प्रभु कहे, “एहो बाह्य, आगे कह आ र” ।
राय कहे , - “ज्ञान - शून्या भक्ति - साध्य - सार” ॥66॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर, भगवान ने, हमेशा की तरह, इसे बाह्य भक्ति समझकर अस्वीकार कर दिया। उन्होंने पुनः रामानन्द राय से आगे बोलने के लिए कहा, और रामानन्द राय ने उत्तर दिया, "विचार-रहित शुद्ध भक्ति ही पूर्णता का सार है।"
 
Hearing this, Mahaprabhu, as before, rejected it, considering it superficial devotion. He asked Ramanand Rai to continue. Ramanand Rai replied, “Pure devotion devoid of knowledge is the essence of perfection.”
तात्पर्य
अपनी अनुभाष्य टीका में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि यह अवस्था - सट्टा ज्ञान के साथ मिली भक्ति सेवा - भी बाहरी होती है और वैकुंठलोक में की जाने वाली शुद्ध भक्ति सेवा के अधिकार-क्षेत्र में नहीं होती। जैसे ही भौतिकवादी विचार की कुछ अवधारणा होती है - चाहे वह हो सकारात्मक या नकारात्मक - वह सेवा आध्यात्मिक नहीं है। यह भौतिक संदूषण से मुक्त हो सकती है, लेकिन क्योंकि मानसिक अटकल है, भक्ति सेवा शुद्ध नहीं है और भौतिक जीवन के संदूषण से मुक्त नहीं है। एक जीव जो पूरी तरह से शुद्ध होना चाहता है, उसे इस भौतिक अवधारणा से ऊपर होना चाहिए। भौतिक अस्तित्व का नकारात्मक अर्थ आवश्यक रूप से आध्यात्मिक अस्तित्व नहीं है। भौतिक अस्तित्व के नकार दिए जाने के बाद, आध्यात्मिक अस्तित्व - अर्थात् सच्चिदानंद - अभी भी प्रकट नहीं हो सकता। जब तक कोई सर्वोच्च प्रभु के साथ अपने शाश्वत संबंध को वास्तव में समझने के स्तर पर नहीं पहुँच जाता, वह आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकता। आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है भौतिक जीवन से अलग होना और भगवान की प्रेममयी सेवा में संलग्न होना। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय को सट्टा ज्ञान के साथ मिश्रित भक्ति सेवा के लिए कुछ पारलौकिक समझाने के लिए कहा। एक शुद्ध भक्त पूरी तरह से भगवान के चरण-कमलों के प्रति समर्पित है, और केवल उनके प्रेम से ही वह कृष्ण को जीत लेता है, जिसे कोई नहीं जीत सकता। कृष्ण हमेशा हर चीज पर विजयी होते हैं। कोई उन्हें हरा नहीं सकता। केवल पूर्ण रूप से समर्पण करके ही शुद्ध भक्ति की अवस्था प्राप्त की जा सकती है। यह अगला श्रीमद्-भागवतम (10.14.3) द्वारा समर्थित है, जिसमें भगवान ब्रह्मा, श्री कृष्ण की शक्ति से पराजित होकर, पूरी तरह से भगवान के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)