श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  2.8.65 
ब्रह्म - भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥65॥
 
 
अनुवाद
रामानंद राय ने आगे कहा, "भगवद्गीता के अनुसार, 'जो इस प्रकार दिव्य स्थिति में स्थित हो जाता है, वह तुरन्त ही परम ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है और पूर्ण आनंदित हो जाता है। वह कभी शोक नहीं करता, न ही किसी वस्तु की इच्छा करता है। वह प्रत्येक जीव के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है।'"
 
Ramanand Rai continued, “According to the Bhagavad Gita, ‘One who has attained this transcendental position immediately realizes the Supreme Brahman and becomes completely happy. He neither worries nor desires anything. He is equanimous toward all living beings. In that state, he attains complete devotion to Me.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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