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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.8.64 
प्रभु कहे, - “एहो बाह्य, आगे कह आ र” ।
राय कहे, “ज्ञान - मिश्रा भक्ति - साध्य - सार” ॥64॥
 
 
अनुवाद
रामानन्द राय को इस प्रकार बोलते हुए सुनकर भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुनः उनके कथन को अस्वीकार कर दिया और कहा, “आगे बढ़ो और कुछ और कहो।”
 
Hearing Ramanand Rai speak in this way, Sri Chaitanya Mahaprabhu rejected his statement and said, “Say something else.” Then Ramanand Rai said, “Devotion mixed with knowledge is the essence of perfection.”
तात्पर्य
रामानंद राय ने उत्तर दिया, "अनुभवात्मक ज्ञान के साथ मिश्रित भक्ति पूर्णता का सार है।"

गैर-वैदिक सैद्धांतिक ज्ञान के साथ मिश्रित भक्ति निश्चित रूप से शुद्ध भक्ति नहीं है। इसलिए श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ने अपने अनुभाष्य में उपदेश दिया है कि कर्मकांड अनुष्ठानों के निष्पादन के बाद आत्म-साक्षात्कार मुक्ति और सशर्त जीवन के बीच तटस्थ स्थिति में है। यह इस भौतिक दुनिया से परे, विराज नदी में एक स्थान है, जहां भौतिक प्रकृति के तीनों गुण अव्यक्त अवस्था में दब या निष्प्रभावी हो जाते हैं। हालाँकि, आध्यात्मिक दुनिया आध्यात्मिक ऊर्जा की अभिव्यक्ति है और इसे वैकुंठलोक के रूप में जाना जाता है, "वह स्थान जहाँ चिंता नहीं है।" भौतिक दुनिया, जिसे ब्रह्मांड के रूप में जाना जाता है, बाहरी ऊर्जा की रचना है। दो रचनाओं - भौतिक सृजन और आध्यात्मिक सृजन - के बीच एक नदी है जिसे विराज के रूप में जाना जाता है, साथ ही एक स्थान है जिसे ब्रह्मलोक के रूप में जाना जाता है। विराज-नदी और ब्रह्मलोक भौतिक जीवन से घृणा करने और भौतिक विविधता को नकारकर अवैयक्तिक अस्तित्व की ओर प्रवृत्त जीवों के लिए आश्रय हैं। चूँकि ये स्थान वैकुंठलोक या आध्यात्मिक दुनिया में स्थित नहीं हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें बाहरी घोषित करते हैं। ब्रह्मलोक और विराज-नदी में, कोई भी वैकुण्ठलोक की कल्पना नहीं कर सकता। ब्रह्मलोक और विराज-नदी भी कठोर तपस्याओं के बाद प्राप्त होती हैं, लेकिन इन लोकों में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व और उनकी दिव्य प्रेममय सेवा की कोई समझ नहीं होती है। इस तरह के आध्यात्मिक ज्ञान के बिना, भौतिक परिस्थितियों से केवल मोह त्यागना भौतिक अस्तित्व का ही दूसरा रूप है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह सब बाहरी है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, तो रामानंद राय ने सुझाव दिया कि दर्शन और तर्क पर आधारित भक्ति सेवा एक अधिक उन्नत स्थिति है। इसलिए उन्होंने भगवद्-गीता (18.54) से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)