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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.8.63 
सर्व - धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्व - पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥63॥
 
 
अनुवाद
"जैसा कि शास्त्र [भ.गी. 18.66] में कहा गया है, 'यदि तुम सभी प्रकार के धार्मिक और व्यावसायिक कर्तव्यों को त्यागकर, मुझ भगवान की, शरण में आओ, तो मैं तुम्हें जीवन के सभी पाप कर्मों से सुरक्षा प्रदान करूँगा। चिंता मत करो।'"
 
"As the scriptures say (Bhagavad Gita 18.66), if you abandon all religious and prescribed duties and surrender to Me, the Lord, I will free you from the consequences of all the sinful activities of your life. Do not worry."
तात्पर्य
इस संबंध में, श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपनी पुस्तक "मनः-शिक्षा" (2) में निर्देश दिया है:

ना धर्मं नादर्मं श्रुति-गण-निरुक्तं किला कुरु

 व्रजे राधा-कृष्ण-प्रचुर-परिचर्यां इह तनु

इस प्रकार उनका आदेश दिया है कि हमें वेदों में विहित धार्मिक या अधार्मिक गतिविधियों का पालन नहीं करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ मार्ग यह है कि निरंतर भगवान कृष्ण और राधारानी की सेवा में लगे रहें। इस जीवन में यही सब कुछ का उत्कर्ष है। इसी प्रकार, श्रीमद्-भागवतम (4.29.46) में नारद मुनि ने कहा है:

यदा यस्यानुगृह्णाति भगवान आत्म-भावितः

स जहाति मतिं लोके वेदे च परिणिष्ठिताम्

"जब कोई वास्तव में भगवान के प्रति प्रेममय सेवा में लग जाता है, तो वह भौतिक जगत के सभी कर्तव्यों के साथ-साथ वैदिक साहित्य द्वारा निर्धारित सभी कर्तव्यों को त्याग देता है। इस प्रकार व्यक्ति भगवान की सेवा में स्थिर हो जाता है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)