श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  2.8.63 
सर्व - धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्व - पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥63॥
 
 
अनुवाद
"जैसा कि शास्त्र [भ.गी. 18.66] में कहा गया है, 'यदि तुम सभी प्रकार के धार्मिक और व्यावसायिक कर्तव्यों को त्यागकर, मुझ भगवान की, शरण में आओ, तो मैं तुम्हें जीवन के सभी पाप कर्मों से सुरक्षा प्रदान करूँगा। चिंता मत करो।'"
 
"As the scriptures say (Bhagavad Gita 18.66), if you abandon all religious and prescribed duties and surrender to Me, the Lord, I will free you from the consequences of all the sinful activities of your life. Do not worry."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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