इसके विपरीत, अपने कार्यो के परिणामों को त्यागने की प्रक्रिया, उन्हें कृष्ण को अर्पित करके अशुद्ध नहीं मानी जाती है, क्योंकि, भले ही ऐसी प्रक्रिया का तात्पर्य है कि व्यक्ति कृष्ण को सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में पहचानता है, फिर भी यह व्यक्ति को भौतिक मंच पर गतिविधियों में शामिल करता है। चूंकि इस तरह की गतिविधियाँ भौतिक ब्रह्मांड के भीतर हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बाहरी माना। इसे ठीक करने के लिए, रामानंद राय ने सिफारिश की कि भौतिक गतिविधियों को पार करने के लिए व्यक्ति जीवन के त्याग क्रम को अपनाएं। इसका समर्थन श्रीमद-भागवतम (11.11.32) के निम्नलिखित श्लोक से होता है।
