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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.8.61 
प्रभु कहे, - “एहो बाह्य, आगे कह आ र” ।
राय कहे , - “स्वधर्म - त्याग, एइ साध्य - सार” ॥61॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "यह भी बाह्य है। कृपया आगे बढ़ें और इस विषय पर आगे बोलें।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “This too is external. Speak further on this subject.” Then Ramanand Rai replied, “The essence of perfection is to give up one’s prescribed duties in the Varna system.”
तात्पर्य
एक ब्राह्मण अपने परिवार को त्याग सकता है और सन्यास ग्रहण कर सकता है। अन्य-क्षत्रिय और वैश्य-भी अपने परिवार का त्याग करके कृष्ण भक्ति कर सकते हैं। ऐसे त्याग को कर्म-त्याग कहते हैं। इस त्याग से भगवान सर्वोच्च पुरुष संतुष्ट होते हैं।

इसके विपरीत, अपने कार्यो के परिणामों को त्यागने की प्रक्रिया, उन्हें कृष्ण को अर्पित करके अशुद्ध नहीं मानी जाती है, क्योंकि, भले ही ऐसी प्रक्रिया का तात्पर्य है कि व्यक्ति कृष्ण को सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में पहचानता है, फिर भी यह व्यक्ति को भौतिक मंच पर गतिविधियों में शामिल करता है। चूंकि इस तरह की गतिविधियाँ भौतिक ब्रह्मांड के भीतर हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें बाहरी माना। इसे ठीक करने के लिए, रामानंद राय ने सिफारिश की कि भौतिक गतिविधियों को पार करने के लिए व्यक्ति जीवन के त्याग क्रम को अपनाएं। इसका समर्थन श्रीमद-भागवतम (11.11.32) के निम्नलिखित श्लोक से होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)