श्री चैतन्य महाप्रभु आध्यात्मिक दुनिया से संबंध रखते हैं और संकीर्तन आंदोलन के प्रचार के उनके तरीके भी आध्यात्मिक दुनिया से आयात किए गए हैं। श्रील नरसिंह दास ठाकुर ने गाया है: गोलोकरा प्रेम-धन, हरि-नाम-संकरीर्तन, रति ना जनमिला केने ताया। इससे पता चलता है कि संकीर्तन आंदोलन का इस भौतिक दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। इसे आध्यात्मिक दुनिया, गोलोक वृंदावन से आयात किया जाता है। नरसिंह दास ठाकुर इस बात पर शोक व्यक्त करते हैं कि सांसारिक लोग इस संकीर्तन आंदोलन को गंभीरता से नहीं लेते हैं। भक्ति सेवा और संकीर्तन आंदोलन की स्थिति को देखते हुए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने वर्णाश्रम-धर्म की प्रणाली को भौतिक माना, हालांकि इसका उद्देश्य आध्यात्मिक मंच तक पहुँचना है। हालाँकि, संकीर्तन आंदोलन व्यक्ति को तुरंत आध्यात्मिक मंच तक ले जा सकता है। फलस्वरूप यह कहा जाता है कि वर्णाश्रम-धर्म बाहरी है, और चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय से अनुरोध किया कि वे मामले में और आगे बढ़ें और आध्यात्मिक मंच का अनावरण करें।
कभी-कभी भौतिकवादी भगवान विष्णु को एक भौतिक अवधारणा मानते हैं। अवैयक्तिकवादी सोचते हैं कि भगवान विष्णु से ऊपर अवैयक्तिक ब्रह्म है। अवैयक्तिकवादी भगवान विष्णु की पूजा को गलत समझते हैं। वे भगवान विष्णु की पूजा उनके शरीर में विलीन होने के लिए करते हैं। विष्णु-आराधना को गलत न समझा जाए, इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनुरोध किया कि श्री रामानंद राय आगे बढ़ें और इस मुद्दे को स्पष्ट करें। रामानंद राय ने भगवद-गीता के श्लोक को उद्धृत किया जिसमें कहा गया है कि किसी के कर्त्तव्य कर्म के परिणाम भगवान विष्णु या कृष्ण को अर्पित किए जा सकते हैं। श्रीमद्-भागवतम (1.2.8) में भी कहा गया है:
धर्मः स्व-अनुष्ठितः पुंसाम विश्वक्सेन-कथासु यः
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्
"यदि कोई वर्णाश्रम-धर्म के व्यावसायिक कर्तव्यों का पालन करता है, लेकिन अपनी सुप्त कृष्ण चेतना की खेती नहीं करता है, तो उसकी गतिविधियाँ निरर्थक हैं। उसका पेशा केवल अनावश्यक श्रम बन जाता है।"
