अतः पुंभिर्द्विज-श्रेष्ठ वर्णाश्रम-विभागशः
स्व-अनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर हरि-तोषणम्
"हे द्विजातियों में श्रेष्ठ, इसलिए यह निष्कर्ष निकला है कि जाति-विभाग और जीवन के क्रम के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करके जो सर्वोच्च सिद्धि कोई प्राप्त कर सकता है, वह है भगवान का संतोषण।"
हर मनुष्य को अपनी विशेष रुचि के अनुसार अपना व्यवसाय करना चाहिए। अपनी योग्यता के अनुसार, व्यक्ति को वर्णाश्रम संस्था में पद ग्रहण करना चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समाज के अंदर प्राकृतिक विभाजन हैं। वास्तव में, वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार हर किसी का एक निर्धारित कर्तव्य है। जो लोग ठीक तरह से अपने निर्धारित कर्तव्यों को निभाते हैं, वे शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं और भौतिक स्थितियों से विचलित नहीं होते हैं। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास जैसे आध्यात्मिक क्रमों को आश्रम कहा जाता है। यदि कोई सामाजिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्रमों में अपने निर्धारित कर्तव्य को निभाता है, तो भगवान की सर्वोच्च विभूति संतुष्ट होती है। परंतु, यदि कोई अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, तो वह अपराधी बन जाता है और नारकीय स्थिति का उम्मीदवार बन जाता है। वास्तव में हम देखते हैं कि अलग-अलग लोग अलग-अलग प्रकार से लगे हुए हैं; इसलिए काम के अनुसार विभाजन होना चाहिए। सिद्धि प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को भक्ति सेवा को जीवन का केंद्र बनाना चाहिए। इस तरह से व्यक्ति अपने प्राकृतिक गुणों को काम, संगति और शिक्षा से जगा सकता है। व्यक्ति को जन्म से नहीं, योग्यता से वर्णाश्रम विभाजन को स्वीकार करना चाहिए। जब तक इस व्यवस्था को अपनाया नहीं जाता है, मानवीय गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से निष्पादित नहीं किया जा सकता है।
ब्राह्मण बुद्धिजीवी होते हैं जो भगवान की सर्वोच्च विभूति को समझ सकते हैं। वे हमेशा ज्ञान प्राप्त करने में लगे रहते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई भारत में पैदा हुआ है या भारत से बाहर। वे लोग जो स्वाभाविक रूप से बहुत वीर होते हैं और दूसरों पर शासन करना चाहते हैं, उन्हें क्षत्रिय कहा जाता है। वे लोग जो कृषि विधियों से भोजन उत्पादित करते हैं, गायों और अन्य पशुओं की रक्षा करते हैं और व्यापार करते हैं, उन्हें वैश्य या व्यापारी कहा जाता है। वे लोग जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बनने के लिए पर्याप्त बुद्धिमान नहीं होते हैं, उनके लिए एक स्वामी की सेवा करना आवश्यक है और उन्हें शूद्र कहा जाता है। इस तरह से हर कोई भगवान की सेवा में संलग्न हो सकता है और अपनी प्राकृतिक कृष्ण चेतना को जगा सकता है। यदि समाज ऐसे प्राकृतिक विभाजनों के अनुसार कार्य नहीं करता है, तो सामाजिक व्यवस्थाएँ पतनशील हो जाती हैं। निष्कर्ष यह है कि समाज द्वारा वर्णाश्रम-धर्म की वैज्ञानिक विधि को अपनाया जाना चाहिए।
