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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.8.56 
नमस्कार कैल राय, प्रभु कैल आलिङ्गने ।
दुइ जने कृष्ण - कथा कय रहः - स्थाने ॥56॥
 
 
अनुवाद
रामानन्द राय भगवान श्री चैतन्य के पास पहुँचे और उन्हें सादर प्रणाम किया, और भगवान ने उन्हें गले लगा लिया। फिर वे एकांत स्थान पर कृष्ण पर चर्चा करने लगे।
 
Ramanand Rai came to Mahaprabhu and offered his respectful obeisances, and Mahaprabhu embraced him. Then, in a secluded place, they began to discuss Krishna.
तात्पर्य
राहः-स्थाने शब्द, जिसका मतलब है, "एकांत स्थान," बहुत महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण और उनके लीलाओं के बारे में बातचीत - विशेष रूप से वृंदावन में उनकी लीलाएं और गोपियों के साथ उनका व्यवहार - यह सभी बहुत ही गोपनीय है। वे सार्वजनिक चर्चा के विषय नहीं हैं क्योंकि जिन लोगों को कृष्ण की लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति की समझ नहीं होती है, वे हमेशा बहुत बड़े अपराध करते हैं, कृष्ण को सामान्य इंसान और गोपियों को सामान्य लड़कियाँ मानते हैं। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांत का पालन करते हुए, जिन्होंने कभी भी कृष्ण और गोपियों के बीच के लेन-देन को सार्वजनिक रूप से नहीं बताया, कृष्ण भावना आंदोलन के भक्तों को कृष्ण की वृंदावन लीलाओं पर सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करने की सलाह दी जाती है। आम जनता के लिए, कृष्ण भावना को जगाने के लिए कीर्तन सबसे प्रभावी तरीका है। यदि संभव हो, तो भगवद-गीता में बताए गए सिद्धांतों पर चर्चा करनी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस सिद्धांत का बहुत सख्ती से पालन किया और उन्होंने सर्वभौम भट्टाचार्य और प्रकाशानंद सरस्वती जैसे विद्वान विद्वानों के साथ भगवद-गीता के दर्शन पर चर्चा की। हालाँकि, उन्होंने भक्ति पंथ के सिद्धांतों को सनातन गोस्वामी और रूप गोस्वामी जैसे छात्रों को बताया, और उन्होंने श्री रामानंद राय के साथ कृष्ण और गोपियों के बीच सबसे भक्ति भावना वाले लेन-देन पर चर्चा की। आम आबादी के लिए, उन्होंने बहुत जोरदार तरीके से कीर्तन किया। हमें भी पूरी दुनिया में कृष्ण भावना के प्रचार में इन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)