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श्लोक 2.8.53  |
यद्यपि विच्छेद दोंहार सहन ना याय ।
तथापि दण्डवत्क रि’ चलिला राम - राय ॥53॥ |
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| अनुवाद |
| यद्यपि दोनों में से कोई भी एक दूसरे से अलग होना सहन नहीं कर सका, फिर भी रामानन्द राय ने भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रणाम किया और चले गये। |
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| Although both of them could not bear the separation from each other, Ramanand Rai still saluted Mahaprabhu and took leave from there. |
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