श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 51-52
 
 
श्लोक  2.8.51-52 
राय कहे, आइला यदि पामर शोधिते ।
दर्शन - मात्रे शुद्ध नहे मोर दुष्ट चित्ते ॥51॥
दिन पाँच - सात र हि’ करह मार्जन ।
तबे शुद्ध हय मोर एइ दुष्ट मन ॥52॥
 
 
अनुवाद
रामानंद राय ने उत्तर दिया, "हे प्रभु, यद्यपि आप मुझ पतित आत्मा को सुधारने आए हैं, फिर भी आपके दर्शन मात्र से मेरा मन अभी शुद्ध नहीं हुआ है। कृपया पाँच-सात दिन रुककर मेरे कलुषित मन को शुद्ध कीजिए। इतने समय के बाद, मेरा मन अवश्य ही शुद्ध हो जाएगा।"
 
Ramanand Rai replied, "O Lord, although you have come to purify me, the fallen one, my mind has not yet been purified by seeing you. Please stay for five to seven days and purify my contaminated mind. My mind will surely become pure within these days."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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