वाग्-ईशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि
यस्यास्ते हृदये संवित तं नृसिंहमहं भजे
"भगवान नृसिंहदेव के मुख पर हमेशा सरस्वती, विद्या की देवी रहती हैं, और वे हमेशा अपने अंतर में भाग्य की देवी को गले लगाते हैं। भगवान स्वयं में सदैव पूर्ण हैं। हम सब नृसिंहदेव को प्रणाम करें।"
इसी तरह, श्रीमद-भागवतम (1.1.1) के पहले स्कंध पर अपनी टीका में, श्रीधर स्वामी भगवान नृसिंहदेव का इस प्रकार वर्णन करते हैं:
प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्
शरद-इंदु-रुचिं वंदे पारिंद्र-वदनं हरिम
"मैं भगवान नृसिंहदेव को प्रणाम करता हूं, जो सदैव प्रह्लाद महाराज को अपने हृदय में आलोकित करते हैं और जो भक्तों के मन में हमेशा ज्ञानहीनता का नाश करते हैं। उनकी दया चांदनी की तरह फैली हुई है, और उनका मुख सिंह के समान है। मैं उन्हें बार-बार प्रणाम करता हूं।"
