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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.8.5 
“श्री - नृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह ।
प्रह्लादेश जय पद्मा - मुख - पद्म - भृङ्ग” ॥5॥
 
 
अनुवाद
“नृसिंहदेव की जय हो! नृसिंहदेव की जय हो, जो प्रह्लाद महाराज के स्वामी हैं और मधुमक्खी की तरह सदैव लक्ष्मी के कमल-सदृश मुख को निहारने में लगे रहते हैं।”
 
"Victory to Lord Nrisimha! Victory to Lord Nrisimha! Victory to Lord Nrisimha, the Lord of Prahlada Maharaja, who, like a bumblebee, is always engaged in gazing upon the lotus-like face of Goddess Lakshmi."
तात्पर्य
सौभाग्य की धनदेवी सदैव भगवान नृसिंहदेव के साथ रहती हैं। यह श्रीमद-भागवतम की टीका में उल्लेखित है जो महान टीकाकार श्रील श्रीधर स्वामी द्वारा लिखी गई है। श्रीधर स्वामी ने श्रीमद- भागवत के दशम स्कंध (10.87.1) पर अपनी टीका में, निम्नलिखित श्लोक की रचना की थी:

वाग्-ईशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि

यस्यास्ते हृदये संवित तं नृसिंहमहं भजे

"भगवान नृसिंहदेव के मुख पर हमेशा सरस्वती, विद्या की देवी रहती हैं, और वे हमेशा अपने अंतर में भाग्य की देवी को गले लगाते हैं। भगवान स्वयं में सदैव पूर्ण हैं। हम सब नृसिंहदेव को प्रणाम करें।"

इसी तरह, श्रीमद-भागवतम (1.1.1) के पहले स्कंध पर अपनी टीका में, श्रीधर स्वामी भगवान नृसिंहदेव का इस प्रकार वर्णन करते हैं:

प्रह्लाद-हृदयाह्लादं भक्ताविद्या-विदारणम्

शरद-इंदु-रुचिं वंदे पारिंद्र-वदनं हरिम

"मैं भगवान नृसिंहदेव को प्रणाम करता हूं, जो सदैव प्रह्लाद महाराज को अपने हृदय में आलोकित करते हैं और जो भक्तों के मन में हमेशा ज्ञानहीनता का नाश करते हैं। उनकी दया चांदनी की तरह फैली हुई है, और उनका मुख सिंह के समान है। मैं उन्हें बार-बार प्रणाम करता हूं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)