श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.8.45 
अन्येर कि कथा, आमि - ‘मायावादी सन्न्यासी’ ।
आमिह तोमार स्पर्शे कृष्ण - प्रेमे भासि ॥45॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं एक मायावादी संन्यासी हूँ, एक अभक्त हूँ, फिर भी मैं भी आपको स्पर्श मात्र से कृष्ण के प्रेम सागर में तैर रहा हूँ। और दूसरों की तो बात ही क्या?
 
"Although I am a Mayavadi sannyasi, that is, a non-devotee, yet just by your touch I too am swimming in the ocean of Krishna's love. What to say about others?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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