आकृत्ये - प्रकृत्ये तोमार ईश्वर - लक्षण ।
जीवे ना सम्भवे एइ अप्राकृत गुण ॥43॥
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अनुवाद
"हे प्रभु, आपके आचरण और शारीरिक बनावट के अनुसार, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। सामान्य जीवों में ऐसे दिव्य गुणों का होना असंभव है।"
"O revered one, you are the perfect Supreme Personality of Godhead in your physical characteristics and nature. Such transcendental qualities are impossible to find in ordinary beings."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु की शारीरिक बनावट असाधारण थी। वास्तव में उनका शरीर अपने अनुपात में असाधारण था। उनकी छाती का नाप और उनके अग्र-भुजाओं का नाप एक जैसा था। इसे न्याग्रोध-परिमाण्डल कहते हैं। जहाँ तक उनके स्वभाव की बात है, वे सबके प्रति दयालु थे। भगवान श्री हरि को छोड़कर कोई सबके प्रति दयालु नहीं हो सकता। इसलिए भगवान का नाम कृष्ण है, जिसका अर्थ है "सर्व आकर्षक"। जैसा कि भगवद्-गीता (१४.४) में कहा गया है, कृष्ण प्रत्येक के दयालु पिता हैं। प्रत्येक जीवन-प्रजाति (सर्व-योनिषु) में वे ही मूल पिता हैं, बीज देने वाले हैं (बीज-प्रदः पिता)। तब वे किसी भी प्राणी के प्रति दयालु क्यों नहीं हो सकते? कोई मनुष्य हो सकता है, पशु हो सकता है, यहाँ तक कि पेड़ भी हो सकता है, लेकिन भगवान प्रत्येक के प्रति दयालु हैं। यह ईश्वर का गुण है। गीता में (९.२९) वे कहते हैं, समोऽहं सर्व-भूतेषु: "मैं प्रत्येक के प्रति समान रूप से दयालु हूँ"। और वे सलाह देते हैं, सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज: "सभी दूसरे व्यस्तताओं को त्याग कर केवल मेरे शरण में आ जाओ"। यह शिक्षा केवल अर्जुन के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीवित प्राणी के लिए है। जो भी इस प्रस्ताव का लाभ लेता है वह तुरंत सभी पापपूर्ण गतिविधियों से मुक्त हो जाता है और अपने घर, ईश्वर के पास लौट जाता है। जबकि इस ग्रह पर उपस्थित थे, श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी यही प्रस्ताव दिया।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥