श्रील नरत दास ठाकुर ने अपने प्रार्थना (39) में गाया है:
श्री-कृष्ण-चैतन्य-प्रभु दया करो मोरे,
तोमा बिना के दयालु जगत्-संसार
पतित-पावन-हेतु तव अवतार,
मो सम पतित प्रभु ना पाईबे आर
“हे प्रभु, कृपा करके मुझ पर दया करें। इन तीनों लोकों में आपकी महिमा से ज्यादा दयालु कौन होगा? आप केवल पतित और पापी आत्माओं को उबारने के लिए अवतार लेते हो, परन्तु मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मुझे से अधम आत्मा आप नहीं पायेंगे।”
श्री चैतन्य महाप्रभु का विशिष्ट मिशन पतित आत्माओं को मुक्ति दिलाना है। बेशक, इस कलियुग में शायद ही कोई ऐसा हो जो वैदिक मानदंडों के अनुसार पतित ना हो। श्री रूप गोस्वामी को दिए अपने निर्देशों में श्री चैतन्य महाप्रभु ने वैदिक धर्म के तथाकथित अनुयायियों का इस प्रकार वर्णन किया है (मध्य 19.146):
वेद-निष्ठ-मध्ये अर्डेका वेद ‘मुखे’ माने
वेद-निषिद्ध पाप करे, धर्म नाही गणे
वैदिक सिद्धांतों के तथाकथित अनुयायी केवल औपचारिक रूप से वेदों को स्वीकार करते हैं, परन्तु वे वैदिक सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य करते हैं। यह इस कलियुग का लक्षण है। लोग औपचारिक रूप से कहते हैं, "मैं हिंदू हूँ", "मैं मुसलमान हूँ", "मैं ईसाई हूँ", "मैं यह हूँ या वह हूँ", परन्तु वास्तव में कोई भी धार्मिक ग्रंथों में बताए सिद्धांतों का पालन नहीं करता। यह इस युग की बीमारी है। इसलिए दयालु श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें केवल हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने की सलाह दी है: हरि नाम हरि नाम हरि नामाएव केवलम। प्रभु किसी को भी और हर किसी को मुक्त कर सकता है, भले ही उस व्यक्ति ने धर्मग्रंथों की आज्ञाओं का उल्लंघन किया हो। यह श्री चैतन्य महाप्रभु की विशेष कृपा है। फलस्वरूप उन्हें पतित-पावन, सभी पतित आत्माओं के उद्धारकर्ता के रूप में जाना जाता है।
