श्री-भगवान उवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहम् अव्ययम्
विवस्वान मनवे प्राह मानुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्
"भगवान कहते हैं, 'इस अविनाशी योग विज्ञान को मैंने सूर्य-देव, विवस्वान को दिया था, और विवस्वान ने इसे मनु को बताया था जो मानव जाति के जनक हैं, और मनु ने बदले में इसे इक्ष्वाकु को बताया।' "
इस तरह यह संदेश प्रामाणिक आध्यात्मिक शिष्य परम्परा में प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से प्रामाणिक शिष्य तक पहुँचाया जाता है। श्रील कविराज गोस्वामी इसलिए हमेशा कि तरह इस अध्याय को छह गोस्वामी के चरण-कमलों में अपनी आस्था को दोहराकर समाप्त करते हैं। इसलिए वे इस अलौकिक साहित्य, श्री चैतन्य-चरितामृत को स्थापित करने में सक्षम हैं।
