Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 312
 
 
श्लोक  2.8.312 
दामोदर - स्वरूपेर कड़चा - अनुसारे ।
रामानन्द - मिलन - लीला करिल प्रचारे ॥312॥
 
 
अनुवाद
मैंने श्रीस्वरूप दामोदर की पुस्तिकाओं के अनुसार भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु की रामानन्द राय से भेंट की लीलाओं का प्रचार करने का प्रयास किया है।
 
I have propagated the meeting-pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu and Ramanand Rai as per the Gutakas of Sri Swarup Damodar.
तात्पर्य
प्रत्येक अध्याय के अंत में, लेखक शिष्य परम्परा के मूल्य को स्वीकार करता है। वह कभी भी यह दावा नहीं करता कि इस अलौकिक साहित्य को उसने अनुसंधान कार्य कर के लिखा है। वह केवल स्वीकार करता है कि वह ऋणी है स्वरूप दामोदर, रघुनाथ दास गोस्वामी और अन्य प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा लिए गए नोट्स का। ये अलौकिक साहित्य लिखने का तरीका है, जो कभी भी तथाकथित विद्वानों और अनुसन्धानकर्ताओं के लिए नहीं है। प्रक्रिया यह है: महाजनो येन गतः स पंथा: अर्थात महान व्यक्तियों और आचार्यों का अनुसरण करना है। आचार्य-वां पुरुषो वेद: यानि जिस पर आचार्य का अनुग्रह है वो सब कुछ जानता है। कविराज गोस्वामी द्वारा किया गया ये कथन सभी शुद्ध भक्तो के लिए बहुत ही मूल्यवान है। कई बार प्राकृत सहजिया दावा करते हैं कि वो अपने गुरु से सत्य सुनते हैं। पर कोई भी उस गुरु से केवल सुनकर अलौकिक ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता जो सच्चा नहीं है। गुरु को सच्चा होना चाहिए और उसे अपने सच्चे गुरु से सुना होना चाहिए। तभी उसके संदेश को सच्चा माना जाएगा। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (4.1) में इसकी पुष्टि की है:

श्री-भगवान उवाच

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहम् अव्ययम्

विवस्वान मनवे प्राह मानुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्

"भगवान कहते हैं, 'इस अविनाशी योग विज्ञान को मैंने सूर्य-देव, विवस्वान को दिया था, और विवस्वान ने इसे मनु को बताया था जो मानव जाति के जनक हैं, और मनु ने बदले में इसे इक्ष्वाकु को बताया।' "

इस तरह यह संदेश प्रामाणिक आध्यात्मिक शिष्य परम्परा में प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु से प्रामाणिक शिष्य तक पहुँचाया जाता है। श्रील कविराज गोस्वामी इसलिए हमेशा कि तरह इस अध्याय को छह गोस्वामी के चरण-कमलों में अपनी आस्था को दोहराकर समाप्त करते हैं। इसलिए वे इस अलौकिक साहित्य, श्री चैतन्य-चरितामृत को स्थापित करने में सक्षम हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)