Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.8.3 
पूर्व - रीते प्रभु आगे गमन करिला ।
‘जियड़ - नृसिंह’ - क्षेत्रे कत - दिने गेला ॥3॥
 
 
अनुवाद
अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भ्रमण पर आगे बढ़े और कुछ दिनों के बाद जियाद-नृसिंह नामक तीर्थ स्थान पर पहुँचे।
 
According to his earlier program, Sri Chaitanya Mahaprabhu travelled further and after a few days reached the pilgrimage place called Jiyad-Nrisimha.
तात्पर्य
जियड़ा-नृसिंह मंदिर, विशाखापत्तनम से लगभग पाँच मील दूर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। दक्षिण भारतीय रेलवे पर सिंहअचल नामक एक रेलवे स्टेशन है। सिंहअचल के नाम से जाना जाने वाला मंदिर, विशाखापत्तनम के आसपास का सबसे अच्छा मंदिर है। यह मंदिर बहुत समृद्ध है और यह क्षेत्र की वास्तुकला का एक विशिष्ट उदाहरण है। एक पत्थर की पटिया पर उल्लेख किया गया है कि पूर्व में एक रानी ने देवता को सोने की प्लेट से ढँक दिया था। इसका उल्लेख विशाखापत्तन गजेटियर में किया गया है। मंदिर के बारे में, पुजारियों और भक्तों के लिए आवासीय क्वार्टर हैं। वास्तव में, वर्तमान समय में आने वाले भक्तों के लिए कई आवासीय क्वार्टर हैं। मूल देवता मंदिर की गहराई के भीतर स्थित है, लेकिन एक अन्य देवता, एक डुप्लीकेट, जिसे विजया-मूर्ति के रूप में जाना जाता है, है। इस छोटे देवता को मंदिर से हटाकर सार्वजनिक जुलूसों में ले जाया जा सकता है। पुजारी जो आम तौर पर रामानुज-सम्प्रदाय से संबंधित होते हैं, वे देवता पूजा के प्रभारी हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)