श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि वृजाभूमि में यमुना नदी है, जिसके किनारे रेतीले हैं। वहाँ कदंब के पेड़, गायें, कृष्ण की लाठियाँ जिनके साथ वे गायों को चराते हैं, और कृष्ण की बाँसुरी है। ये सभी शांत-रस से संबंधित हैं, जो भक्ति सेवा में तटस्थता का भाव है। वहाँ कृष्ण के प्रत्यक्ष सेवक भी हैं, जैसे चित्रक, पत्रक और रक्तक, और ये सेवा के अवतार हैं जो दासता के भाव से संबंधित है। श्रीदामा और सुदामा जैसे मित्र भी हैं, जो भाईचारे में सेवा का अवतार हैं। नंद महाराज और माता यशोदा माता-पिता प्रेम के अवतार हैं। इन सबसे ऊपर श्रीमती राधारानी और उनकी सहायक गोपियाँ ललिता, विशाखा और अन्य हैं, जो वैवाहिक प्रेम का अवतार हैं। इस तरह पाँचों भाव - शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य - वृजाभूमि में सदा बने रहते हैं। उनकी तुलना क्रमशः तांबे, कलई, चांदी, सोना और कसौटी के साथ की जाती है, जो सभी धातुओं का आधार है। इसलिए श्रील कावीराज गोस्वामी वृंदावन, वृजाभूमि में सदा विद्यमान एक खदान का उल्लेख करते हैं।
