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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 291
 
 
श्लोक  2.8.291 
आमि - एक बातुल, तुमि - द्वितीय बातुल ।
अतएव तोमाय आमाय हइ सम - तुल ॥291॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य महाप्रभु ने तब कहा, "वास्तव में, मैं पागल हूँ और तुम भी पागल हो। इसलिए हम एक ही मंच पर हैं।"
 
Chaitanya Mahaprabhu then said, "I am indeed a mad person, and you are also mad. Therefore, we are both on the same level."
तात्पर्य
श्री रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच ये सभी वार्तालाप एक सामान्य व्यक्ति को जो भक्त नहीं है, हास्यास्पद लगते हैं। पूरी दुनिया भौतिक अवधारणाओं से भरी हुई है और लोगों को सांसारिक दर्शन की कंडीशनिंग के कारण इन वार्तालापों को समझने में असमर्थ हैं। जो लोग सांसारिक गतिविधियों से अत्यधिक जुड़े हुए हैं, वे रामानंद राय और चैतन्य महाप्रभु के बीच की आनंददायक बातचीत को नहीं समझ सकते हैं। फलस्वरूप प्रभु ने अनुरोध किया कि रामानंद राय इन सभी वार्तालापों को गुप्त रखें और उन्हें आम आबादी के सामने न लाएं। यदि कोई वास्तव में कृष्ण चेतना में उन्नत है, तो वह इन गोपनीय वार्ता को समझ सकता है, अन्यथा वे पागलपन लगती हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसलिए रामानंद राय को बताया कि वे दोनों पागलों की तरह दिखाई देते हैं और इसलिए वे एक ही मंच पर हैं। भगवद् गीता (2.69) में इसकी पुष्टि की गई है:

या निशा सर्व-भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:

"जो सभी प्राणियों के लिए रात है, वह संयमी के लिए जागने का समय है, और जो सभी प्राणियों के लिए जागने का समय है, वह आत्मनिष्ठ मुनि के लिए रात है।"

कभी-कभी कृष्ण चेतना सांसारिक लोगों को एक प्रकार का पागलपन लगता है, जैसे सांसारिक लोगों की गतिविधियों को कृष्ण चेतना वाले लोग पागलपन का एक रूप मानते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)