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अनुवाद
“मैंने अब अपने शरीर और मन को श्रीमती राधारानी के आनंद में परिवर्तित कर लिया है; इस प्रकार मैं उस रूप में अपनी निजी मधुरता का आस्वादन कर रहा हूँ।”
"Now I have imbued my body and mind with the consciousness of Srimati Radharani. In this way, I am savoring my own sweetness in that form."
तात्पर्य
गौरासुंदर ने यहाँ श्री रामानन्द राय को सूचित किया, "मेरे प्रिय रामानन्द राय, आप वास्तव में गोरे रंग के शरीर वाले एक अलग व्यक्ति को देख रहे थे। वास्तव में मैं गोरा नहीं हूँ। नंद महाराज के पुत्र श्री कृष्ण होने के नाते, मैं काला हूँ, लेकिन जब मैं श्रीमती राधारानी के संपर्क में आता हूँ तो मैं बाहरी रूप से गोरा हो जाता हूँ। श्रीमती राधा राणी कृष्ण के अलावा किसी के भी शरीर को स्पर्श नहीं करती हैं। मैं श्रीमती राधा राणी के रंग को स्वीकार करके अपनी खुद की पारलौकिक विशेषताओं का आनंद लेता हूँ। राधा राणी के बिना, कोई कृष्ण के संयुग्मित प्रेम के पारलौकिक सुख का आनंद नहीं ले सकता।" इस संबंध में, श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदाय पर टिप्पणी की, जो कृष्ण और भगवान चैतन्य को अलग-अलग शरीर वाले मानता है। वे 287वें पाठ में गौरा अंग नाहे मोरा शब्दों की गलत व्याख्या करते हैं। उस पद और वर्तमान पद से हम समझ सकते हैं कि भगवान चैतन्य महाप्रभु कृष्ण से भिन्न नहीं हैं। दोनों ही परम भगवान हैं। कृष्ण के रूप में, भगवान आध्यात्मिक आनंद का आनंद लेते हैं और सभी भक्तों की शरण, विषय-विग्रह बने रहते हैं। और अपने गौरांग स्वरूप में कृष्ण, श्रीमती राधा राणी के उन्माद में कृष्ण से अलग होने का स्वाद लेते हैं। यह उत्साही रूप श्री कृष्ण चैतन्य है। श्री कृष्ण हमेशा सभी सुखों के पारलौकिक भंडार हैं, और उन्हें तकनीकी रूप सेधीर-ललित कहा जाता है। श्रीमती राधा राणी आध्यात्मिक ऊर्जा का अवतार हैं, जो कृष्ण के लिए परमानंदपूर्ण प्रेम के रूप में व्यक्त होती हैं; इसलिए केवल कृष्ण ही उन्हें स्पर्श कर सकते हैं। विष्णु और नारायण सहित भगवान के किसी अन्य रूप मेंधीर-ललित पहलू नहीं देखा जाता है। इसलिए श्रीमती राधा राणी को गोविंद-नंदिनी और गोविंद-मोहिनी के रूप में जाना जाता है, क्योंकि वे श्री कृष्ण के लिए पारलौकिक सुख का एकमात्र स्रोत हैं और एकमात्र ऐसी व्यक्ति हैं जो उनके मन को मोहित कर सकती हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥