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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 276
 
 
श्लोक  2.8.276 
वन - लतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्प - फलाढ याः ।
प्रणत - भार - विटपा मधु - धाराः प्रेम - हृष्ट - तनवो ववृषुः स्म ॥276॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण के प्रेमोन्मत्त होने के कारण पौधे, लताएँ और वृक्ष फलों और फूलों से लदे हुए थे। सचमुच, इतने भरे होने के कारण, वे नतमस्तक हो रहे थे। वे कृष्ण के प्रति इतने गहरे प्रेम से प्रेरित थीं कि वे निरंतर मधु की वर्षा कर रही थीं। इस प्रकार गोपियों ने वृंदावन के सभी वनों को देखा।”
 
"The plants, creepers, and trees were laden with flowers and fruits, bowing down in a trance of love for Krishna. They were inspired by such intense love for Krishna that they were continuously showering honey. In this way, the gopis saw the entire forest of Vrindavan."
तात्पर्य
यह श्लोक (भा. 10.35.9) उन गीतों में से एक है जो कृष्ण के विरह में गोपियाँ गाती थीं। कृष्ण के विरह में गोपियाँ हमेशा उनके चिन्तन में लीन रहतीं थीं। इसी तरह, महा-भागवत, परम भक्त, हर चीज को भगवान की संभावित सेवा के रूप में देखता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं:

प्रापंचिकतया बुद्धया हरि-संबंधि-वस्तुनः

मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्रु कथ्यते

(भक्ति-रसामृत-सिन्धु 1.2.126)

परम भक्त किसी भी चीज को कृष्ण से असंबद्ध नहीं देखता। मायावादी दार्शनिकों के विपरीत, एक भक्त भौतिक दुनिया को मिथ्या नहीं मानता, क्योंकि वह जानता है कि भौतिक दुनिया में हर चीज कृष्ण से जुड़ी हुई है। एक भक्त जानता है कि प्रभु की सेवा में हर चीज का उपयोग कैसे करना है, और यह महाभागवत की विशेषता है। गोपियों ने देखा कि पौधे, बेलें और जंगल के पेड़ फलों और फूलों से लदे हुए हैं और कृष्ण की सेवा के लिए तैयार हैं। इस तरह उन्हें तुरंत उनके पूजनीय स्वामी श्री कृष्ण की याद आ गई। उन्होंने केवल पौधों, बेलों और पेड़ों को उस तरह नहीं देखा जैसे कोई सांसारिक व्यक्ति उन्हें देखता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)