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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 274
 
 
श्लोक  2.8.274 
स्थावर - जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति ।
सर्वत्र हय निज इष्ट - देव - स्फूर्ति ॥274॥
 
 
अनुवाद
महाभागवत, अर्थात् उन्नत भक्त, निश्चित रूप से सभी चल और अचल वस्तुओं को देखता है, किन्तु वह उनके स्वरूप को ठीक-ठीक नहीं देख पाता। बल्कि, वह सर्वत्र परमेश्वर के स्वरूप को प्रत्यक्ष देखता है।
 
"The great devotee, the great Bhagavata, certainly sees all things, movable and immovable, but he does not see their external forms. Rather, wherever he looks, he immediately sees the manifestation of the form of the Lord."
तात्पर्य
कृष्ण जी के प्रति गहन भावना के कारण महाभागवत सभी जगह कृष्ण को देखता है, सिवाय उनके और कुछ नहीं। ब्रम्हासहिता में इसका वर्णन है (5.38):

प्रेमाण्जन-चुरिता-भक्ति-विलोचनेन संताः सदैव ह्रदयेषु विलोकयन्ति।

जैसे ही एक भक्त कुछ देखता है, चाहे वह कोई चलने फिरने वाली चीज़ या कोई निर्जीव वस्तु क्यों न हो, उसे तुरंत कृष्ण की याद आ जाती है। एक उन्नत भक्त ज्ञान में भी उन्नत होता है। यह ज्ञान एक भक्त के लिए बहुत स्वाभाविक है, क्योंकि उसने भगवद गीता में पहले से पढ़ लिया है कि किस तरह कृष्ण चेतना को जाग्रत किया जाए। भगवद गीता में भगवान कृष्ण के अनुसार (7.8):

रसो ऽहम अप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशि सूर्ययोः

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु

"हे कुन्ती पुत्र [अर्जुन], मैं पानी का स्वाद हूँ, सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश हूँ, वेद मन्त्रों में ॐ ऋण हूँ; मैं आकाश में ध्वनी हूँ और मनुष्यों में क्षमता हूँ।"

इसलिए जब एक भक्त पानी या कोई अन्य तरल पीता है, तो उसे तुरंत कृष्ण याद आ जाते हैं। एक भक्त के लिए चौबीसों घंटे कृष्ण चेतना को जाग्रत करने में कोई दिक्कत नहीं होती। इसलिए चैतन्य महाप्रभु यहां कहते हैं:

स्थावर जंगम देखे ना देखे तार मूर्ति

सर्वत्र हय निज इष्ट देव-स्फूर्ति

एक महापुरुष, एक उन्नत भक्त चौबीसों घंटे बस कृष्ण को देखता है, और कुछ नहीं। जहां तक चलने-फिरने वाली और निर्जीव चीज़ों की बात है, एक भक्त उन्हें कृष्ण की ऊर्जा के परिवर्तनों के रूप में देखता है। जैसे भगवान कृष्ण ने भगवद गीता में कहा है (7.4):

भूमि आपो ऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा

"पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और झूठा अहंकार - ये सभी मिलकर मेरी विभाजित भौतिक ऊर्जाएं बनाते हैं।"

वास्तव में, कृष्ण से अलग कुछ भी नहीं है। जब एक भक्त एक पेड़ को देखता है, तो वह जानता है कि पेड़ दो ऊर्जाओं - भौतिक और आध्यात्मिक का संयोजन है। निम्न ऊर्जा, जो भौतिक है, पेड़ के शरीर को बनाती है; हालाँकि, पेड़ के भीतर जीवित इकाई, आध्यात्मिक चिंगारी है, जो कृष्ण का अंश है। यह इस दुनिया में कृष्ण की श्रेष्ठ ऊर्जा है। हम जो भी जीवित चीज़ देखते हैं वह बस इन दो ऊर्जाओं का संयोजन है। जब एक उन्नत भक्त इन ऊर्जाओं के बारे में सोचता है, तो वह तुरंत समझ जाता है कि वे सर्वोच्च भगवान की अभिव्यक्तियाँ हैं। जैसे ही हम सुबह सूर्य को उगते हुए देखते हैं, हम उठते हैं और अपने सुबह के कर्तव्यों को करने लग जाते हैं। उसी तरह, जैसे ही एक भक्त भगवान की ऊर्जा को देखता है, उसे तुरंत भगवान श्री कृष्ण की याद आ जाती है। इसका वर्णन इस श्लोक में किया गया है: सर्वत्र हय निज इष्ट देव-स्फूर्ति।

एक भक्त जिसने भक्ति सेवा के माध्यम से अपने अस्तित्व को शुद्ध कर लिया है, वह जीवन के हर कदम पर केवल कृष्ण को ही देखता है। इसका वर्णन अगले श्लोक में भी किया गया है, जो श्रीमद्भगवत (11.2.45) से उद्धृत है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)