श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 265
 
 
श्लोक  2.8.265 
अन्तर्यामी ईश्वरेर एइ रीति हये ।
बाहिरे ना कहे, वस्तु प्रकाशे हृदये ॥265॥
 
 
अनुवाद
रामानंद राय ने आगे कहा, "प्रत्येक के हृदय में स्थित परमात्मा बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से बोलता है। वह भक्तों को सभी प्रकार से शिक्षा देता है, और यही उसकी शिक्षा का तरीका है।"
 
Ramanand Rai further said, "God speaks from within each person's heart, not from outside. He teaches his devotees in all ways, and this is his method of preaching."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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