जो लोग भगवान के अस्तित्व में विलय करके मुक्ति की इच्छा करते हैं, वे भौतिक जगत में इंद्रिय-सुख की इच्छा नहीं रखते हैं। दूसरी ओर, उन्हें प्रभु के चरण-कमलों की सेवा के विषय में कोई जानकारी नहीं है। फलतः, वे हज़ारों वर्षों तक पेड़ों की तरह खड़े रहने को अभिशप्त हैं। यद्यपि पेड़ जीवित प्राणी हैं, लेकिन वे गतिहीन हैं। जो मुक्त आत्मा प्रभु के अस्तित्व में विलीन होती है, वह पेड़ों से बेहतर नहीं है। भौतिक ऊर्जा और प्रभु की ऊर्जा एक ही होने के कारण पेड़ भी प्रभु के अस्तित्व में खड़े हैं। इसी प्रकार, ब्रह्म-तेज भी परमेश्वर की ऊर्जा है। ब्रह्म-तेज में रहने या भौतिक ऊर्जा में रहने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, क्योंकि दोनों में से किसी में भी आध्यात्मिक गतिविधि नहीं होती है। वे बेहतर स्थिति में हैं जो इंद्रिय-सुख और स्वर्गीय लोकों में पदोन्नति की इच्छा रखते हैं। ऐसे लोग स्वर्ग के निवासियों की तरह स्वर्ग के बगीचों में आनंद उठाना चाहते हैं। कम से कम वे जीवन का आनंद लेने के लिए अपने व्यक्तित्व को बनाए रखते हैं। लेकिन जो अवैयक्तिकवादी हैं, जो अपने व्यक्तित्व को खोने का प्रयास करते हैं, वे भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही सुखों को खो देते हैं। बौद्ध विचारकों का अंतिम गंतव्य एक पत्थर की तरह बनना है, जो अचल है और जिसमें न तो भौतिक है और न ही आध्यात्मिक गतिविधि।
जहाँ तक कर्मकांडी मेहनत-कशों का सवाल है, श्रीमद्भागवतम (11.10.23) में कहा गया है:
"ईश्वरस्तु देवता यज्ञैः स्वर्ग लोकं याति याज्निकः |
भुंजीत देववत् तत्र भोगान् दिव्यान् निजार जितान्" ||
"स्वर्गीय लोकों में उन्नति के लिए विभिन्न यज्ञ-अनुष्ठान करने के बाद, कर्मकांडी वहाँ जाते हैं और देवताओं के साथ अपने धर्म-कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त सुखों का उपभोग करते हैं।"
भगवद्गीता (9.20-21) में भगवान कृष्ण कहते हैं:
"त्रैविद्या माँ सोमपाः पूत-पापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते
ते पुण्यं आसाद्य सुरेंद्रलोकम्
अश्नन्ति दिव्यान दिवि देवा-भोगान्"
"ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्य लोकं विशन्ति
एवं त्रयीधर्मम् अनुप्रपन्नाः
गतागतं काम कामा लभन्ते"
"जो लोग वेदों का अध्ययन करते हैं और स्वर्गीय लोकों की तलाश में सोमरस पीते हैं, वे अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं। पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से शुद्ध होकर, वे इन्द्र के पवित्र, स्वर्गीय ग्रह पर जन्म लेते हैं, जहाँ वे दिव्य आनंद का आनंद लेते हैं। जब वे इस प्रकार विशाल स्वर्गीय इंद्रिय-सुख और अपने धर्म-कर्मों के परिणामों का आनंद ले चुके होते हैं, तो वे फिर इस नश्वर ग्रह पर लौट आते हैं। इस प्रकार जो लोग तीनों वेदों के सिद्धांतों का पालन करके इंद्रिय-सुख की तलाश करते हैं, वे केवल बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त करते हैं।"
इसलिए, धर्म-कर्मों के परिणामों को समाप्त करने के बाद, कर्मकांडी इस ग्रह पर वर्षा के रूप में वापस लौटते हैं, और विकासवादी प्रक्रिया में घास और पौधों के रूप में अपना जीवन शुरू करते हैं।
