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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 255
 
 
श्लोक  2.8.255 
‘श्रवण - मध्ये जीवेर कोन्श्रेष्ठ श्रवण ?’ ।
‘राधा - कृष्ण - प्रेम - केलि कर्ण - रसाय न’ ॥255॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, "लोग जितने भी विषय सुनते हैं, उनमें से कौन सा विषय सभी जीवों के लिए सर्वोत्तम है?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu asked, “Of all the subjects to be heard, which one is the best for all living beings?” Ramanand Rai replied, “Listening to the love affairs of Radha and Krishna is the most pleasing to the ears.”
तात्पर्य
रामानंद राय ने उत्तर दिया, "राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों के बारे में सुनना कानों के लिए सबसे कर्णप्रिय है।"

श्रीमद्-भागवतम (10.33.39) के अनुसार:

विक्रीडितं व्रज-वधूभिरिदं च विष्णोः

श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथा वर्णयेद्यः

भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं

हृद्रोगमाश्व पहीनोत्यचिरेण धीरः

"वह जो भगवान कृष्ण और गोपियों के बीच रास नृत्य की बातों को श्रद्धापूर्वक सुनता है और वह जो इन गतिविधियों का वर्णन करता है, भक्ति सेवा की पूर्णावस्था को प्राप्त हो जाता है और साथ ही साथ भौतिक, कामुक इच्छाओं को त्याग देता है।"

एक मुक्त पुरुष जो राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों के बारे में सुनता है, उसके मन में कामुक इच्छाएँ उत्पन्न नहीं होतीं। एक सांसारिक दुष्ट ने एक बार कहा था कि जब वैष्णव "राधा, राधा" नाम का जाप करते हैं, तो उसे बस राधा नामक एक नाई की पत्नी याद आती है। यह एक व्यावहारिक उदाहरण है। जब तक कोई मुक्त नहीं हो जाता, तब तक उसे राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों के बारे में सुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि कोई मुक्त नहीं है और रास नृत्य के संबंधों को सुनता है, तो उसे अपनी सांसारिक गतिविधियों और किसी महिला के साथ अवैध संबंधों की याद आ सकती है जिसका नाम भी राधा हो सकता है। संसार की स्थिति में किसी को भी ऐसी चीजों को याद करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। नियमों का अभ्यास करके, व्यक्ति को कृष्ण के लिए सहज आकर्षण के चरण तक उठना चाहिए। तभी और तभी किसी को राधा-कृष्ण-लीला के बारे में सुनना चाहिए। यद्यपि ये प्रेम संबंध संसार में बंधे और मुक्त दोनों आत्माओं के लिए बहुत ही सुखदायक हो सकते हैं, लेकिन बंधे हुए आत्मा को उन्हें सुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। रामानंद राय और श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच की बातचीत मुक्ति के स्तर पर की गई है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)