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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 254
 
 
श्लोक  2.8.254 
‘सर्व त्य जि’ जीवेर कर्तव्य काहाँ वास ?’ ।
‘व्रज - भूमि वृन्दावन याहाँ लीला - रास’ ॥254॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, "जीव को अन्य सभी स्थानों को त्यागकर कहाँ रहना चाहिए?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu asked, “Where should a living being, having abandoned all other places, live?” Ramanand Rai replied, “He should live in the holy place called Vrindavan or Vrajabhumi, where the Lord performed the Rasa dance.”
तात्पर्य
श्री रामानंद राए ने उत्तर दिया, "वृंदावन या व्रजभूमि नामक पवित्र स्थान में निवास करना चाहिए, जहां प्रभु ने अपना रास नृत्य किया था।"

श्रीमद-भागवतम् (10.47.61) के अनुसार:

आसां अहो चरण-रेणु-जुषाम् अहं स्यां

 वृंदावने किमपि गुल्म-लतौषधीनाम्

या दुस्त्यजं स्व-जनम् आर्य-पथं च हित्वा

 भेञ्जुर मुकुंद-पादवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्

उद्धव ने कहा, "मैं वृंदावन की उन जड़ी-बूटियों और पौधों में से बनूं जो गोपियों द्वारा कुचली जाती हैं, जिन्होंने परिवार और दोस्तों के साथ सभी संबंध त्याग दिए और मुकुंद के चरण-कमलों की पूजा करने का फैसला किया। उन चरण-कमलों की सभी महान संतों द्वारा मांग की जाती है जो वैदिक साहित्य के अध्ययन में विशेषज्ञ हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)