इस बारे में, भगवान वैदिक साहित्य में कहते हैं:
माम् अनाराध्य दुःखार्तः कुटुम्बा सक्त मानसः |
सत्संग रहितो मत्यो वृद्ध सेवा परिक्षुतः ||
"एक व्यक्ति जो मेरी पूजा नहीं करता, जो परिवार से अनिर्दिष्ट रूप से जुड़ा हुआ है और जो भक्ति सेवा से चिपकता नहीं है, उसे सबसे दुखी व्यक्ति माना जाना चाहिए। इसी तरह, जो वैष्णवों के साथ नहीं जुड़ता है, या जो अपने श्रेष्ठ की सेवा नहीं करता है, वह भी सबसे दुखी व्यक्ति है।"
बृहद्-भागवतामृत (1.5.54) में भी निम्नलिखित कथन है:
स्व-जीविनाधिकं प्रार्थ्यं श्री-विष्णु-जन-संगतः |
विच्छेदन केषणं चात्र न सुखांशं लभामहे ||
"एक जीव के जीवन में अनुभव की जाने वाली सभी प्रकार की वांछनीय चीजों में से, भगवान के भक्तों के साथ जुड़ाव सबसे बड़ा है। जब हम एक भक्त से एक पल के लिए भी अलग हो जाते हैं, तो हम खुशी का आनंद नहीं ले सकते।"
