किसी भी प्राणी की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा कृष्ण का भक्त होना और कृष्ण भावना में कार्य करना हो सकता है। भौतिक दुनिया में हर कोई एक बड़ी बैंक शेष या भौतिक वैभव जमा करके प्रसिद्ध होने की कोशिश कर रहा है। एक संपन्न समाज में आगे बढ़ने का प्रयास करने वाले कर्मियों के बीच एक निरंतर प्रतिस्पर्धा है। पूरी दुनिया उसी प्रतिस्पर्धात्मक मनोदशा के अनुसार बदल रही है। लेकिन इस तरह का नाम और प्रसिद्धि अस्थायी है, क्योंकि यह केवल तभी तक रहता है जब तक कि अस्थायी भौतिक शरीर मौजूद है। कोई ब्रह्म-ज्ञानी, एक अवैयक्तिक विद्वान के रूप में प्रसिद्ध हो सकता है, या कोई भौतिक रूप से संपन्न व्यक्ति बन सकता है। किसी भी मामले में, ऐसी प्रतिष्ठा कृष्ण भक्त की प्रतिष्ठा से कम है। गरुड़ पुराण में कहा गया है:
कलौ भागवतं नाम दुर्लभं नैव लभ्यते
ब्रह्म-रुद्र-पादोत्कृष्टं गुरुणा कथितं मम
"इस कलियुग में, एक महान भक्त के रूप में जाने जाने वाले व्यक्ति की प्रसिद्धि बहुत दुर्लभ है। हालाँकि, ऐसी स्थिति ब्रह्मा और महादेव जैसे महान देवताओं की स्थिति से श्रेष्ठ है। यह सभी आध्यात्मिक गुरुओं की राय है।"
इतिहास-समुच्चय में, नारद पुंडरीक को बताते हैं:
जन्मान्तर-सहस्रेषु यस्य स्याद् बुद्धिरीदृशी
दासोऽहं वासुदेवस्य सर्वाल्लोकान् समुद्धरेत्
"कई जन्मों के बाद, जब कोई व्यक्ति यह महसूस करता है कि वह वासुदेव का शाश्वत सेवक है, तो वह सभी लोकों को मुक्त कर सकता है।"
आदि पुराण में, कृष्ण और अर्जुन के बीच एक बातचीत में, यह कहा गया है, भक्तानाम अनुगच्छन्ति मुक्तयः श्रुतिभिः सह: "मुक्ति की सबसे ऊँची स्थिति वैदिक ज्ञान द्वारा दी जाती है। हर कोई भक्त के पदचिन्हों पर चलता है।" इसी तरह, बृहन्नारदीय पुराण में, आगे कहा गया है, अद्यपि च मुनिश्रेष्ठा ब्रह्माद्या अपि देवताः: "अभी तक, ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे महान देवताओं को भी एक भक्त के प्रभाव का पता नहीं था।" गरुड़ पुराण भी इसी तरह बताता है:
ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्र-याजी विशिष्यते
सत्र-याजी-सहस्रेभ्यः सर्व-वेदान्त-परागः
सर्व-वेदान्त-वित्-कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते
वैष्णवानां सहस्रेभ्य एकान्त्य एको विशिष्यते
"ऐसा कहा जाता है कि हजारों ब्राह्मणों में से एक व्यक्ति बलिदान करने के योग्य होता है, और ऐसे योग्य ब्राह्मणों के हजारों में से, बलि प्रसाद में विशेषज्ञ एक विद्वान ब्राह्मण सभी वैदिक ज्ञान से परे हो सकता है। उसे इन सभी ब्राह्मणों में श्रेष्ठ माना जाता है। और फिर भी, वैदिक ज्ञान से आगे निकल चुके ऐसे हजारों ब्राह्मणों में से, एक व्यक्ति विष्णु-भक्त हो सकता है, और वह सबसे प्रसिद्ध है। ऐसे हजारों वैष्णवों में से, जो भगवान कृष्ण की सेवा में पूरी तरह से स्थिर है, वह सबसे प्रसिद्ध है। वास्तव में, जो व्यक्ति भगवान की सेवा के लिए पूरी तरह से समर्पित है, वह निश्चित रूप से घर लौटता है, वापस भगवान के पास।"
श्रीमद-भागवतम (3.13.4) में भी निम्नलिखित कथन है:
श्रुतस्य पुंसां सुचिरा-श्रमस्य
नन्नंजसा सूरिभिर ईडितोऽर्थः
तत्तद्-गुणानुश्रवणं मुकुन्द-
पदावरविन्दं हृदयेषु येषां
"वैदिक साहित्य में बहुत अधिक अध्ययन करने वाले व्यक्ति निश्चित रूप से बहुत प्रसिद्ध हो जाते हैं। हालाँकि, जो अपने हृदय में मुकुंद के चरण-कमलों की महिमा को हमेशा सुनता और जपता रहता है, वह निश्चित रूप से श्रेष्ठ है।"
नारायण-व्यूह-स्तव में कहा गया है:
नाहं ब्रह्मापि भूयासम् त्वद्-भक्ति-रहितो हरे
त्वयि भक्तस्तु कीटोऽपि भूयासम् जन्म-जन्मसु
"मैं ब्रह्मा के रूप में जन्म नहीं लेना चाहता, अगर वह ब्रह्मा भगवान का भक्त नहीं है। अगर मुझे किसी भक्त के घर में रहने का मौका दिया जाए तो मैं केवल कीट के रूप में जन्म लेने से संतुष्ट रहूँगा।"
श्रीमद भागवत में ऐसे ही कई श्लोक हैं, विशेषकर 3.25.38, 4.24.29, 4.31.22, 7.9.24, और 10.14.30।
यह भगवान शिव ही थे जिन्होंने कहा था, "मैं कृष्ण के बारे में सच्चाई नहीं जानता, लेकिन भगवान कृष्ण का भक्त सभी सच्चाई जानता है। भगवान कृष्ण के सभी भक्तों में, प्रह्लाद सबसे महान है।"
प्रह्लाद के भी ऊपर, पाण्डवों को अधिक उन्नत माना जाता है। पाण्डवों से ऊपर, यादव वंश के सदस्य हैं, जो पाण्डवों से भी अधिक उन्नत हैं। यादव वंश में, उद्धव सबसे अधिक उन्नत हैं, और उद्धव से भी ऊपर, व्रज-धाम की गोपियाँ हैं।
बृहद्-वामन पुराण में, भगवान ब्रह्मा, भृगु से कहते हैं:
षष्टि-वर्षा-सहस्राणि मया तप्तं तपः पुरा
नन्द-गोप-व्रज-स्त्रीणां पाद-रेणूपलम्भये
"मैंने केवल गोपियों के चरण-कमलों की धूल को समझने के लिए साठ हजार वर्षों तक ध्यान और तप किया। तब भी, मैं इसे समझ नहीं पाया। मैं तो क्या, स्वयं भगवान शिव, भगवान शेष और भाग्य की देवी, लक्ष्मी भी इसे नहीं समझ सकीं।"
आदि पुराण में स्वयं भगवान कहते हैं:
न तथा मे प्रियतमो ब्रह्मा रुद्रः च पार्तिवा
न च लक्ष्मी न चात्मा च यथा गोपी-जनो ममा
"भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव, भाग्य की देवी और यहाँ तक कि मेरा अपना स्व भी मुझे गोपियों जितना प्रिय नहीं है।" सभी गोपियों में से, श्रीमती राधारानी सर्वोपरि हैं। रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी श्रीमती राधारानी और भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के सबसे ऊंचे सेवक हैं। जो उनके सेवा कार्य का पालन करते हैं, उन्हें रूपानुग भक्त कहा जाता है। चैतन्य-चंद्रामृत (26) श्रील रूप गोस्वामी के बारे में निम्नलिखित कथन देता है:
आस्तां वैराग्य-कोटि भवतु शम-दम-क्षान्ति-मैत्र्य-आदि-कोटिः
तत्वानुध्यान-कोटि भवतु भवतु वा वैष्णवी भक्ति-कोटिः
कोट्य-अंशो ऽप्यस्य न स्यात तदपि गुण-गणो यः स्वतः-सिद्ध आस्ते
श्रीमच्चैतन्यचन्द्र-प्रिय-चरण-नख-ज्योतिर आमोद-भाजाम
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में लगे हुए व्यक्ति के गुण - जैसे प्रतिष्ठा, तपस्या, तप और ज्ञान - की तुलना दूसरों के अच्छे गुणों से नहीं की जा सकती। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा में हमेशा लगे रहने वाले भक्त की पूर्णता ऐसी है।
