श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 230
 
 
श्लोक  2.8.230 
गोपी - आनुगत्य विना ऐश्वर्य - ज्ञाने ।
भजिलेह नाहि पाय व्रजेन्द्र - नन्दने ॥230॥
 
 
अनुवाद
"जब तक कोई गोपियों के पदचिन्हों का अनुसरण नहीं करता, वह नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण के चरणकमलों की सेवा प्राप्त नहीं कर सकता। यदि कोई भगवान के ऐश्वर्य के ज्ञान से अभिभूत है, तो वह भगवान के चरणकमलों को प्राप्त नहीं कर सकता, भले ही वह भक्ति में लीन हो।
 
"Unless a person follows the footsteps of the gopis, he cannot attain the service of the lotus feet of Krishna, the son of Nanda Maharaja. If he is overcome by the knowledge of the Lord's opulence, he cannot attain the Lord's lotus feet, even if he is engaged in devotional service."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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