श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 225
 
 
श्लोक  2.8.225 
‘सम - दृशः’ - शब्दे कहे ‘सेइ भावे अनुगति’ ।
‘समा:’ - शब्दे कहे श्रुतिर गोपी - देह - प्राप्ति ॥225॥
 
 
अनुवाद
पिछले श्लोक की चौथी पंक्ति में उल्लिखित ‘समादृश’ शब्द का अर्थ है ‘गोपियों की मनोदशा का अनुसरण करना।’ ‘समाः’ शब्द का अर्थ है ‘श्रुतियों द्वारा गोपियों के समान शरीर प्राप्त करना।’
 
“The word ‘samadrishah’ mentioned in the fourth line of the previous verse means, ‘following the sentiments of the gopis.’ ‘samaha’ means, ‘by attaining a body like that of the gopis through the scriptures.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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