रागानुग - मार्गे ताँरे भजे येइ जन ।
सेइ - जन पाय व्रजे व्रजेन्द्र - नन्दन ॥221॥
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अनुवाद
“यदि कोई सहज प्रेम के मार्ग पर भगवान की पूजा करता है और वृंदावन जाता है, तो उसे नंद महाराज के पुत्र व्रजेंद्र-नंदन की शरण मिलती है।
“The person who worships the Lord on the path of Raganuga (with spontaneous love) and goes to Vrindavan, gets the shelter of Vrajendranandan, the son of Nanda Maharaj.”
तात्पर्य
कुल मिलाकर, कृष्ण की सेवा के लिए चौंसठ मद सूचीबद्ध हैं, और ये शास्त्रों में दिए गए नियमित सिद्धांत हैं और आध्यात्मिक गुरु द्वारा दिए गए हैं। व्यक्ति को कृष्ण की सेवा इन नियमित सिद्धांतों के अनुसार करनी पड़ती है, लेकिन यदि व्यक्ति व्रजभूमि में रहने वालों की गतिविधियों में प्रदर्शित के रूप में कृष्ण के लिए सहज प्रेम विकसित करता है, तो वह रागानुगा भक्ति के मंच को प्राप्त करता है। जिसने यह सहज प्रेम विकसित किया है वह व्रजभूमि के निवासियों द्वारा प्राप्त मंच की ऊंचाई के लिए पात्र है। व्रजभूमि में, कृष्ण की सेवा के लिए कोई नियमित सिद्धांत नहीं निर्धारित किए गए हैं। बल्कि, सब कुछ कृष्ण के लिए सहज, स्वाभाविक प्रेम में किया जाता है। वैदिक प्रणाली के सिद्धांतों का पालन करने का कोई प्रश्न नहीं है। ऐसे सिद्धांत इस भौतिक दुनिया के भीतर पालन किए जाते हैं, और जब तक कोई भौतिक मंच पर है, तब तक उसे उन्हें निष्पादित करना होता है। हालाँकि, कृष्ण का सहज प्रेम पारलौकिक है। ऐसा लग सकता है कि नियमित सिद्धांतों का उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन भक्त पारलौकिक मंच पर है। ऐसी सेवा को गुणातीत या निर्गुण कहा जाता है, क्योंकि यह भौतिक प्रकृति के तीनों तरीकों से दूषित नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥