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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.8.215 
सहज गोपीर प्रेम , - नहे प्राकृत काम ।
काम - क्रीड़ा - साम्ये तार कहि ‘काम’ - नाम ॥215॥
 
 
अनुवाद
"यह ध्यान देने योग्य है कि गोपियों का स्वाभाविक गुण परम भगवान से प्रेम करना है। उनकी काम-वासना की तुलना भौतिक वासना से नहीं की जा सकती। फिर भी, चूँकि उनकी इच्छा कभी-कभी भौतिक वासना जैसी प्रतीत होती है, इसलिए कृष्ण के प्रति उनके दिव्य प्रेम को कभी-कभी वासना कहा जाता है।
 
"It is noteworthy that love for the Supreme Lord is an innate quality of the gopis. Their sexual desire should not be equated with physical lust. Yet, sometimes their desire appears to be like physical lust, so their transcendental love for Krishna is sometimes called "lust."
तात्पर्य
भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते हैं कि भौतिक इच्छा को कभी भी कृष्ण को नहीं अपनाना चाहिए, जो दिव्य ज्ञान से भरे हैं। भौतिक इच्छा को प्रभु की सेवा में नहीं लगाया जा सकता है, क्योंकि यह भौतिकवादियों के लिए लागू है, कृष्ण के लिए नहीं। केवल प्रेम, या ईश्वर का प्रेम, कृष्ण को संतुष्ट करने के लिए लागू है। प्रेम प्रभु को प्रदान की गई पूर्ण सेवा है। गोपियों के कामुक मामले वास्तव में ईश्वर के सर्वोच्च प्रेम का गठन करते हैं क्योंकि गोपियाँ कभी भी अपने व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए कार्य नहीं करती हैं। वे केवल अन्य गोपियों को प्रभु की सेवा में लगाकर प्रसन्न होती हैं। गोपियों को अन्य गोपियों को कृष्ण की सेवा में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल करने से स्वयं उनकी सेवा करने से ज्यादा दिव्य सुख मिलता है। यही भौतिक वासना और ईश्वर के प्रेम के बीच का अंतर है। वासना भौतिक दुनिया पर लागू होती है, और ईश्वर का प्रेम केवल कृष्ण पर लागू होता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)