अन्योन्ये विशुद्ध प्रेमे करे रस पुष्ट ।
ताँ - सबार प्रेम दे खि’ कृष्ण हय तुष्ट ॥214॥
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अनुवाद
"भगवान के दिव्य प्रेम में पारस्परिक व्यवहार से दिव्य मधुरता का पोषण होता है। जब भगवान कृष्ण देखते हैं कि गोपियों ने उनके प्रति किस प्रकार शुद्ध प्रेम विकसित कर लिया है, तो वे अत्यंत संतुष्ट हो जाते हैं।
"The transcendental essence is confirmed in the mutual love of the Lord. When Krishna sees how the gopis have developed pure love for him, he is deeply gratified."
तात्पर्य
श्रीमती राधारानी एवं गोपियां, कृष्ण के साथ संबंध से प्राप्त होने वाले अपने वैयक्तिक सुख में रुचि नहीं रखती हैं। इसके विपरीत, वे एक दूसरे को कृष्ण के साथ संबंध बनाते हुए देखकर खुश हो जाती हैं। इस तरह उनकी भावनाएं भगवत्प्रेम के द्वारा और अधिक पोषित होती हैं, और इसे देखकर कृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥