श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 210
 
 
श्लोक  2.8.210 
कृष्ण - लीलामृत यदि लताके सिञ्चय ।
निज - सुख हैते पल्लवाद्येर कोटि - सुख हय ॥210॥
 
 
अनुवाद
“जब कृष्ण की लीलाओं का अमृत उस लता पर छिड़का जाता है, तो टहनियों, फूलों और पत्तियों से प्राप्त होने वाला सुख, लता से प्राप्त होने वाले सुख से करोड़ गुना अधिक होता है।
 
“When the nectar of Krishna-Leela is sprinkled on this creeper, the happiness that the branches, flowers and leaves receive is a crore times greater than that of the creeper.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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