उज्जवल-नीलमणि (सखी-प्रकरण 1) में श्रील रूप गोस्वामी सलाह देते हैं:
प्रेम-लीला-विहारणाम
सम्यक् विस्तारिका सखी
विश्रम्भ-रत्न-पेटी च
जो कृष्ण और गोपियों के बीच संभोग प्रेम का विस्तार करता है उसे सखी कहा जाता है। ऐसा व्यक्ति संभोग संबंधों में एक विश्वासपात्र गोपी होता है। ऐसे सहायक कृष्ण के विश्वासपात्रों के रूप में रत्न की तरह होते हैं। सखियों के वास्तविक कार्य को उज्जवल-नीलमणि (सखी-प्रकरण 88-91) में इस प्रकार वर्णित किया गया है:
मिथः प्रेम-गुणोत्कीर्तिः त्योर आसक्ति-कारिता
अभिसारो द्वयोर् एव सख्याः कृष्णे समर्पणम्
नर्माश्वासन-नेपथ्यम् हृदयोद्घाट-पटवम्
छिद्र-संवृतिर एतास्याः पत्य-आदेः परिवञ्चना
शिक्षा संगमनम् काले सेवनम् व्यजनादिभिः
त्योर द्वयोर् उपालम्भः संदेश-प्रेषणम् तथा
नायिका-प्राण-संरक्षा प्रयत्नाद्याः सखी-क्रियाः
कृष्ण के संभोग लीलाओं में, कृष्ण नायक (नायक) हैं, और राधिका नायक (नायिका) हैं। गोपियों का पहला काम नायक और नायिका दोनों की महिमा का गुणगान करना है। उनका दूसरा काम धीरे-धीरे ऐसी स्थिति पैदा करना है जिसमें नायक नायिका के प्रति आकर्षित हो सकता है और इसके विपरीत। उनका तीसरा काम उन दोनों को एक-दूसरे के पास लाने के लिए प्रेरित करना है। उनका चौथा काम कृष्ण के प्रति समर्पण करना है, पांचवा एक जीवंत वातावरण बनाना है, छठा उन्हें अपने लीलाओं का आनंद लेने का आश्वासन देना है, सातवां नायक और नायिका दोनों को तैयार करना और सजाना है, आठवां उनकी इच्छाओं को व्यक्त करने में विशेषज्ञता दिखाना है, नायिका के दोषों को छिपाने के लिए, दसवां उनके संबंधित पतियों और रिश्तेदारों को धोखा देना, ग्यारहवां शिक्षित करना, बारहवां नायक और नायिका दोनों को उचित समय पर मिलने में सक्षम बनाना, तेरहवां नायक और नायिका की प्रशंसा करना, चौदहवां कभी-कभी नायक और नायिका को फटकारना, पंद्रहवां बातचीत शुरू करना, और सोलहवां नायिका को विभिन्न तरीकों से सुरक्षित रखना है।
कुछ भौतिकवादी सहजिया जो वास्तव में राधा और कृष्ण के लीलाओं को नहीं समझ सकते हैं, वे प्रामाणिकता का हवाला दिए बिना अपनी जीवन-शैली बनाते हैं। ऐसे सहजियों को सखी-भेकी कहा जाता है, और कभी-कभी उन्हें गौरा-नागरी कहा जाता है। वे मानते हैं कि भौतिक शरीर, जो गीदड़ और कुत्तों द्वारा खाए जाने के लिए उपयुक्त है, कृष्ण के लिए आनंददायक है। परिणामस्वरूप वे कृष्ण को आकर्षित करने के लिए भौतिक शरीर को कृत्रिम रूप से सजाते हैं, खुद को सखी समझते हैं। लेकिन भौतिक शरीर के कृत्रिम संवारने से कृष्ण कभी आकर्षित नहीं होते हैं। जहां तक श्रीमती राधारानी और उनकी गोपियाँ हैं, उनके शरीर, घर, वस्त्र, आभूषण, प्रयास और गतिविधियाँ सभी आध्यात्मिक हैं। ये सभी कृष्ण की आध्यात्मिक इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए हैं। वास्तव में, वे कृष्ण के लिए इतनी प्रसन्न और प्यारी हैं कि वे श्रीमती राधारानी और उनके दोस्तों के प्रभाव से वश में हो जाते हैं। ब्रह्मांड की चौदह ग्रह प्रणालियों के भीतर सांसारिक किसी भी चीज से उनका कोई लेना-देना नहीं है। हालाँकि कृष्ण सभी के लिए आकर्षक हैं, फिर भी वे गोपियों और श्रीमती राधारानी से आकर्षित होते हैं।
मानसिक कल्पनाओं से भ्रमित न होना चाहिए और अपने भौतिक शरीर को परिपूर्ण मानकर स्वयं को सखी समझना चाहिए। यह कुछ हद तक आहंग्रहोपासना जैसा है, अर्थात, एक मायावादी अपनी मूर्ति की, परम के रूप में पूजा करता है। श्रील जीव गोस्वामी ने मुंडन करने वालों को ऐसी अवधारणाओं से दूर रहने की चेतावनी दी है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि गोपियों के पदचिन्हों का अनुसरण किए बिना खुद को सर्वोच्च का सहयोगी मानना उतना ही अपमानजनक है जितना खुद को सर्वोच्च मानना। इस तरह की सोच अपराध है। कृष्ण के साथ गोपियों की बातों को सुनकर वृंदावन में रहने का अभ्यास करना पड़ता है। हालाँकि, किसी को भी खुद को गोपी नहीं समझना चाहिए, क्योंकि यह अपमानजनक है।
