श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 201
 
 
श्लोक  2.8.201 
राधा - कृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर ।
दास्य - वात्सल्यादि - भावे ना हय गोचर ॥201॥
 
 
अनुवाद
"राधा और कृष्ण की लीलाएँ अत्यंत गोपनीय हैं। उन्हें दासता, बंधुत्व या माता-पिता के स्नेह के माध्यम से नहीं समझा जा सकता।
 
"The pastimes of Radha and Krishna are profound. They cannot be understood through the sentiments of dasya, sakhya, or vatsalya."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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