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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 194
 
 
श्लोक  2.8.194 
पहिलेहि राग नयन - भङ्गे भेल
अनुदिन बाढ़ल, अवधि ना गेल
ना सो रमण, ना हाम रमणी
दुँहु - मन मनोभव पेषल जा नि’
ए सखि, से - सब प्रेम - काहिनी
कानु - ठामे कहबि विछुरल जानि’
ना खोंज लुँ दूती, ना खोंज लुँ आन्
दुँहुकेरि मिलने मध्य त पाँच - बाण
अब्सोहि विराग, तुँहु भेलि दूती
सु - पुरुख - प्रेमकि ऐछन रीति ॥194॥
 
 
अनुवाद
“ 'अफसोस, हमारे मिलने से पहले ही हमारे बीच एक प्रारंभिक आसक्ति थी जो नज़रों के आदान-प्रदान से उत्पन्न हुई थी। इस तरह आसक्ति विकसित हुई। वह आसक्ति धीरे-धीरे बढ़ी है, और इसकी कोई सीमा नहीं है। अब वह आसक्ति हमारे बीच एक स्वाभाविक क्रम बन गई है। ऐसा नहीं है कि यह कृष्ण, जो भोक्ता हैं, के कारण है, न ही यह मेरे कारण है, क्योंकि मैं ही भोक्ता हूँ। ऐसा नहीं है। यह आसक्ति परस्पर मिलन से संभव हुई थी। आकर्षण के इस पारस्परिक आदान-प्रदान को मनोभाव या कामदेव के रूप में जाना जाता है। कृष्ण का मन और मेरा मन एक हो गए हैं। अब, इस वियोग के दौरान, इन प्रेम संबंधों को समझाना बहुत कठिन है। मेरे प्रिय मित्र, यद्यपि कृष्ण ये सब बातें भूल गए होंगे, तुम समझ सकते हो और यह संदेश उन तक पहुँचा सकते हो। लेकिन हमारी पहली मुलाकात के दौरान हमारे बीच कोई दूत नहीं था, न ही मैंने किसी से उन्हें देखने का अनुरोध किया था। वास्तव में, कामदेव के पाँच बाण हमारे माध्यम थे। अब, इस वियोग के दौरान, वह आकर्षण बढ़ गया है "एक अलग ही आनंदमय अवस्था में। मेरे प्रिय मित्र, कृपया मेरी ओर से एक संदेशवाहक बनो, क्योंकि अगर कोई किसी सुंदर व्यक्ति से प्रेम करता है, तो उसका यही परिणाम होता है।"
 
"Alas! Before we met, there was an initial attraction between us through our exchange of glances. Thus, the attraction continued to develop. This attraction has gradually increased, and now it knows no bounds.
तात्पर्य
ये पद मूलतः स्वयं रामनंद राय ने रचे और गाए थे। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर सुझाव देते हैं कि संयोग के समय वह आसक्ति कामदेव के समान ही हो सकती है। लेकिन, वियोग के समय कामदेव अति ऊंचे प्रेम के दूत बन जाते हैं। इसे प्रेम-विलास-विवर्त कहते हैं। जब विरह होता है, संयोग-सुख स्वंय दूती बन जाता है और उसी दूती को श्रीमती राधारानी ने सखी के रूप में सम्बोधित किया है। इस क्रिया का सार यह है कि दिव्य प्रेम-क्रीड़ा विरह में और संयोग में उतनी ही सुखद है। जब श्रीमती राधारानी कृष्ण-प्रेम में पूर्णतः तल्लीन थीं, तो उन्होंने एक काले तामल वृक्ष को कृष्ण समझ लिया और उसे गले लगा लिया। ऐसी भूल को प्रेम-विलास-विवर्त कहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)