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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  2.8.192 
येबा ‘प्रेम - विलास - विवर्त’ एक हय ।
ताहा शुनि’ तोमार सुख हय, कि ना हय ॥192॥
 
 
अनुवाद
तब राय रामानंद ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बताया कि एक और विषय है, जिसे प्रेम-विलास-विवर्त कहते हैं। रामानंद राय ने कहा, "आप इसके बारे में मुझसे सुन सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं पता कि आप इससे प्रसन्न होंगे या नहीं।"
 
Then Ramanand Rai told Sri Chaitanya Mahaprabhu, "There is another subject called love-vilasa vivarta. If you wish, you can hear it from me, but I cannot say whether it will make you happy or not."
तात्पर्य
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपने अमृत-प्रवाह-भाष्य में कहा है कि इन कथनों को हमारी समझ के लिए प्रस्तुत किया गया है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय से मूल रूप से कहा, "मेरे प्रिय रामानंद, जीवन के लक्ष्य और श्रीमती राधारानी और कृष्ण के लीलाओं के बारे में आपने जो व्याख्या दी है वह निश्चित रूप से सत्य है। यद्यपि यह तथ्यात्मक है, फिर भी अगर कहने के लिए कुछ और है तो आप मुझे और बता सकते हैं।" जवाब में, रामानंद राय ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि मेरे पास इसके अलावा और कुछ कहने के लिए है, लेकिन एक विषय जो प्रेम-विलास-विवर्त के रूप में जाना जाता है, जिसे मैं आपको समझा सकता हूं। मुझे नहीं पता कि यह आपको खुशी देगा या नहीं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)