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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 187
 
 
श्लोक  2.8.187 
राय कहे , - कृष्ण हय ‘धीर - ललित’ ।
निरन्तर काम - क्रीड़ा - याँहार चरित ॥187॥
 
 
अनुवाद
राय रामानंद ने उत्तर दिया, "भगवान कृष्ण धीर-ललिता हैं, क्योंकि वे अपनी सखियों को सदैव वश में रख सकते हैं। अतः उनका एकमात्र कार्य इंद्रिय-तृप्ति का आनंद लेना है।"
 
Ramanand Rai replied, "Lord Krishna is patient because He can always keep His beloveds under control. Thus, His only occupation is to enjoy sense gratification."
तात्पर्य
हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि कृष्ण का इंद्रिय सुख भोग कभी भी भौतिक संसार के इंद्रिय सुख भोग से तुलना में नहीं आ सकता | जैसा कि हमने पहले ही समझाया है, कृष्ण का इंद्रिय सुख भोग सोने के समान है | भौतिक संसार में पाए जाने वाले उस इंद्रिय सुख भोग का विकृत प्रतिबिंब लोहे की तरह है | इसका मतलब यह है कि कृष्ण निराकार नहीं है | इस भौतिक संसार में विकृत प्रतिबिंब में प्रकट होने वाली सभी इच्छाएँ उनके पास हैं | हालाँकि, गुण अलग हैं - एक आध्यात्मिक है, और दूसरा भौतिक है | जैसे जीवन और मृत्यु में अंतर होता है, उसी तरह आध्यात्मिक इंद्रिय सुख भोग और भौतिक इंद्रिय सुख भोग में अंतर होता है |
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)