श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  2.8.178 
निजाङ्ग - सौरभालये गर्व - पर्यङ्क ।
ता’ते वसि’ आछे, सदा चिन्ते कृष्ण - सङ्ग ॥178॥
 
 
अनुवाद
"श्रीमती राधारानी का शयन-स्थल अभिमान ही है, और वह उनकी शारीरिक सुगंध के धाम में स्थित है। वे सदैव कृष्ण की संगति का चिंतन करती हुई वहाँ विराजमान रहती हैं।
 
"Srimati Radharani's bed is pride itself, situated in the abode of Her bodily fragrance. She always sits there, thinking of Krishna's company."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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