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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  2.8.168 
लावण्यामृत - धाराय तदुपरि स्नान ।
निज - लज्जा - श्याम - पट्टसाटि - परिधान ॥168॥
 
 
अनुवाद
“दोपहर के स्नान के बाद, राधारानी शारीरिक तेज के अमृत में पुनः स्नान करती हैं, और लज्जा का वस्त्र पहनती हैं, जो उनकी काली रेशमी साड़ी है।
 
“After her afternoon bath, Srimati Radharani bathes again with the nectar of bodily radiance and then puts on the garment of shame, which is her black silk sari.”
तात्पर्य
अन्य स्नानों के साथ साथ, दोपहर में जो स्नान किया जाता है वह पूर्ण आरोग्य का स्नान है। यह अमृत सौन्दर्य और कांति को दर्शाता है। इस प्रकार स्नान तीन प्रकार के होते हैं। इसके बाद राधारानी दो वस्त्र पहनती हैं एक निचला और एक ऊपरी वस्त्र। ऊपरी वस्त्र गुलाबी रंग का है जो कृष्ण के प्रति उनका लगाव और आकर्षण को दर्शाता है और निचला वस्त्र, एक काली रेशम की साड़ी, उनकी शर्म को दर्शाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)