कारुण्यामृत - धाराय स्नान प्रथम ।
तारुण्यामृत - धाराय स्नान मध्यम ॥167॥
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अनुवाद
“श्रीमती राधारानी अपना पहला स्नान करुणा के अमृत की वर्षा में करती हैं, और वह अपना दूसरा स्नान यौवन के अमृत में करती हैं।
“Srimati Radharani takes her first bath in the stream of nectar of compassion, and the second bath in the nectar of youth.”
तात्पर्य
श्रीमती राधारानी पहले अपने शरीर पर कृष्ण के स्नेह के लेप से उसका भलीभाँति लेपन करती हैं। उसके बाद वे दया के जल से स्नान करती हैं। पौगंड अवस्था (पाँच से दस वर्ष की आयु) से निकलने के बाद श्रीमती राधारानी पहले दया रूप में प्रकट होती हैं। दोपहर में दूसरा स्नान तरुण्यमृत अर्थात यौवन के अमृत में किया जाता है। यह उनकी वास्तविक नयी यौवनवस्था की अभिव्यक्ति है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥