Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 166
 
 
श्लोक  2.8.166 
राधा - प्रति कृष्ण - स्नेह - सुगन्धि उद्वर्तन ।
ता’ते अति सुगन्धि देह - उज्वल - वरण ॥166॥
 
 
अनुवाद
"श्रीमती राधारानी का दिव्य शरीर दीप्तिमान है और सभी दिव्य सुगंधियों से परिपूर्ण है। भगवान कृष्ण का उन पर स्नेह सुगंधित मालिश के समान है।"
 
"Srimati Radharani's transcendental body is radiant and filled with all the divine fragrances. Krishna's affection for her is like a fragrant paste."
तात्पर्य
सुगंधी उद्द्वर्तन कई सुगन्धि और सुगंधित तेलों से बने पेस्ट को कहते हैं। यह पेस्ट पूरे शरीर की मालिश के लिए प्रयोग किया जाता है और इस तरह तन की मैल और पसीना निकल जाता है। श्रीमती राधारानी का शरीर तो सदैव सुगंधित रहता है, किंतु जब उनके शरीर की भगवान कृष्ण के स्नेह के सुगंधित पेस्ट से मालिश की जाती है, तो उनका पूरा शरीर दोगुनी तरह से सुगंधित और चमकदार और कांतिमय हो जाता है। यह कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा श्रीमती राधारानी के अलौकिक शरीर का वर्णन करने की शुरुआत है। यह वर्णन (श्लोक 165-181 में पाए जाने वाले) श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी द्वारा लिखित एक पुस्तक पर आधारित है, जिसे प्रेमाम्भोज-मरण्ड के नाम से जाना जाता है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने मूल संस्कृत का अनुवाद निम्न प्रकार से किया है:

"गोपियों का कृष्ण के लिए प्रेम अलौकिक परमानंद से भरा है। यह चमकदार रत्न की तरह लगता है, और ऐसे अलौकिक रत्न से प्रकाशित होकर, राधारानी का शरीर और अधिक इत्रयुक्त और कुंकुम से सजा हुआ है। सुबह में उनके शरीर को करुणा के अमृत से नहलाया जाता है, दोपहर में यौवन के अमृत से, और शाम को स्वयं ज्योति के अमृत से। इस तरह से स्नान किया जाता है, और उनका शरीर चितामणि रत्न की तरह चमकदार हो जाता है। उन्हें तरह-तरह के रेशमी वस्त्र पहनाए जाते हैं, जिनमें से एक है उनकी प्राकृतिक शर्म।

"उनकी सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है, सौंदर्य के लाल कुंकुम और दांपत्य प्रेम की काली कस्तूरी से सजी हुई है। इस तरह उनका शरीर अलग-अलग रंगों से सुशोभित है। उनके आभूषण परमानंद के प्राकृतिक लक्षणों को समाहित करते हैं - थरथराना, आंसू, उल्लास, अचेत हो जाना, पसीना आना, आवाज का भर्राना, शरीर का लाल होना, पागलपन और सुस्ती। इस तरह उनका पूरा शरीर इन नौ अलग-अलग आभूषणों से सुशोभित है। इसके अतिरिक्त, उनके शरीर की सुंदरता उनके अलौकिक गुणों से बढ़ जाती है, जो उनके शरीर पर लटकने वाले फूलों की माला का निर्माण करते हैं। कृष्ण के लिए प्रेम के परमानंद को धीरा और अधीरा, शांत और बेचैन के रूप में जाना जाता है। ऐसा परमानंद श्रीमती राधारानी के शरीर को ढकता है, और कपूर से सुशोभित है। कृष्ण के प्रति उनका अलौकिक क्रोध उनके सिर पर बालों की व्यवस्था के रूप में सन्निहित है, और उनके महान भाग्य का तिलक उनके सुंदर माथे पर चमकता है। श्रीमती राधारानी के झुमके कृष्ण के पवित्र नाम हैं, साथ ही उनके नाम और यश को सुनना है। कृष्ण के लिए परमानंदपूर्ण स्नेह के पान के कारण उनके होंठ हमेशा लाल रहते हैं। उनकी आंखों के चारों ओर का काला मलहम कृष्ण के साथ उनके चंचल व्यवहार का प्रतीक है जो प्रेम से लाया गया है। कृष्ण के साथ उनका मजाक करना और कोमलता से मुस्कुराना कपूर है जिसके साथ वे सुगंधित हैं। वह अपने कमरे में गर्व की सुगंध के साथ सोती हैं, और जब वह अपने बिस्तर पर लेटती हैं, तो उनके प्रेममय परमानंद की अलौकिक विविधता उनके वियोग के हार के बीच में एक जड़ाऊ लॉकेट की तरह है। उनके अलौकिक स्तन कृष्ण के प्रति स्नेह और क्रोध के रूप में उनकी साड़ी से ढके हुए हैं। उनके पास एक तार वाला वाद्य यंत्र है जिसे कच्छपी-वीणा के रूप में जाना जाता है, जो कि वास्तव में अन्य गोपियों के चेहरे और स्तनों को सुखाने वाली प्रसिद्धि और भाग्य है। वह हमेशा अपने गोपी मित्र के कंधे पर हाथ रखती हैं, जो उनकी यौवन सुंदरता का प्रतिनिधित्व करती है, और हालांकि वह इतनी सारी आध्यात्मिक संपत्ति से अत्यधिक योग्य हैं, फिर भी वह कृष्ण नामक कामदेव से प्रभावित हैं। इस तरह वह पराजित होती हैं। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी अपने मुंह में एक पुआल लेकर श्रीमती राधारानी को अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करते हैं। वास्तव में, वह प्रार्थना करते हैं, 'हे गांधर्विका, श्रीमती राधारानी, जैसे भगवान कृष्ण कभी भी किसी समर्पित आत्मा को अस्वीकार नहीं करते, कृपया मुझे अस्वीकार मत करें।' यह प्रेमाम्भोज-मरण्ड का सारांश अनुवाद है, जिसे कविराज गोस्वामी उद्धृत करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)