श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  2.8.160 
प्रेमेर परम - सार ‘महाभाव’ जानि ।
सेइ महाभाव - रूपा राधा - ठाकुराणी ॥160॥
 
 
अनुवाद
भगवान के प्रेम का आवश्यक भाग महाभाव, दिव्य परमानंद कहलाता है, और उस परमानंद का प्रतिनिधित्व श्रीमती राधारानी करती हैं।
 
“The essence of love for God is called Mahabhava i.e. divine joy and Shrimati Radharani is the representative of this great feeling.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)