श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.8.158 
सुख - रूप कृष्ण करे सुख आस्वादन ।
भक्त - गणे सुख दिते ‘ह्लादिनी’ - कारण ॥158॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण सभी प्रकार के दिव्य सुखों का आस्वादन करते हैं, यद्यपि वे स्वयं साक्षात् सुख हैं। उनके शुद्ध भक्तों द्वारा भोगा गया सुख भी उनकी सुख-शक्ति द्वारा प्रकट होता है।
 
"Lord Krishna, though the embodiment of happiness, enjoys all kinds of transcendental pleasures. The pleasures enjoyed by His pure devotees also manifest through His Hladini potency."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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