परास्तास्मात्तु भा वोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति
"किन्तु इस प्रकट तथा अप्रकट प्रकृति से परे एक और अप्रकट प्रकृति है जो सनातन या अनंत है। यह सर्वश्रेष्ठ है और कभी नष्ट नहीं हो सकती। इस जगत की सर्व-स्व समाप्ति पर भी वह भाग ज्यों-का-त्यों बना रहता है।"
अतः एक और प्रकृति है जो भौतिक प्रकृति से श्रेष्ठ है। भाग या स्वाभाव शब्द प्रकृति को इंगित करता है। आध्यात्मिक प्रकृति शाश्वत है और यहाँ तक कि जब सारे भौतिक विश्व नष्ट हो जाएँ, तब भी आध्यात्मिक जगत के ग्रह बने रहते हैं। वे ठीक उसी तरह बने रहते हैं जैसे आत्मा भौतिक शरीर के नष्ट होने के बाद भी बनी रहती है। उस आध्यात्मिक जगत को अप्राकृत (अभौतिक) जगत कहते हैं। इस पारलौकिक, आध्यात्मिक जगत या विश्व में सर्वोच्च ग्रह मंडल गोलोक वृंदावन कहलाता है। यही स्वयं भगवान कृष्ण का निवास है, जो स्वयं भी पूर्णतः आध्यात्मिक हैं। कृष्ण वहाँ अप्राकृत-मदन नाम से जाने जाते हैं। मदन नाम कामदेव का है, किन्तु कृष्ण आध्यात्मिक मदन हैं। इस भौतिक विश्व के कामदेव के शरीर की तरह उनका शरीर भौतिक नहीं है। कृष्ण का शरीर पूर्णतः आध्यात्मिक है - सच्चिदानंद-विग्रह। इसलिए उन्हें अप्राकृत-मदन कहा जाता है। उन्हें मनमथ-मदन के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि वे कामदेव के लिए भी आकर्षक हैं। कभी-कभी कृष्ण की लीलाओं और आकर्षक रूप-रंग की स्थूल भौतिकवादी लोग गलत व्याख्या कर देते हैं और गोपियों के साथ उनके नृत्य के आधार पर उन्हें अनैतिक होने का आरोप लगाते हैं, किन्तु ऐसा आरोप इस अज्ञानता से उपजता है कि कृष्ण इस भौतिक जगत से सर्वथा परे हैं। उनका शरीर सच्चिदानंद-विग्रह है, पूर्णतः आध्यात्मिक। उनके शरीर में कोई भौतिक दूषण नहीं है और उनके शरीर को माँस और हड्डियों का ढेर नहीं मानना चाहिए। मायावादी दार्शनिक कृष्ण के शरीर को भौतिक मानते हैं, और यह निंदनीय, घोर भौतिकवादी अवधारणा है। जैसे कृष्ण पूर्णतः आध्यात्मिक हैं, वैसे ही गोपियाँ भी आध्यात्मिक हैं और ब्रह्म-संहिता (5.37) में इस बात की पुष्टि की गई है:
आनंद-चिनमय-रस-प्रतिभाविताभिर्
ताभिर्य एवन निजा-रूपतया कलाभिः,
गोलोके एव निवसत्य अखिल-आत्म-भूतः
गोविंदम् आदि पुरुषं तम अहं भजामि।
"मैं आदिपुरुष गोविंद की आराधना करता हूँ। वे गोलोक नामक अपने निज धाम में निवास करते हैं, जहाँ उनकी प्रिया राधा अपने ही समान आध्यात्मिक स्वरूप की हैं और जो आनंददायिनी शक्ति (ह्लादिनी) की मूर्ति हैं। उनकी सखियाँ उनकी विश्वासपात्र हैं, जो उनके शरीर की रूप-परिणति हैं और जो सदा-श्रद्धा से परिपूर्ण और अनुप्रवेशित होती हैं।"
गोपियां भी यही आध्यात्मिक गुण (निज-रूपतया) है क्योंकि वे कृष्ण की आनंद शक्ति के विस्तार हैं। न तो कृष्ण और न ही गोपियों का पदार्थ के ढेर या भौतिक अवधारणा से कोई लेना-देना है। भौतिक दुनिया में जीवित इकाई को भौतिक शरीर में बंद कर दिया जाता है, और अज्ञान के कारण वह सोचता है कि वह शरीर है। इसलिए यहां पुरुष और स्त्री के बीच भोग-लालसा की इच्छा सभी भौतिक है। कोई भी भौतिकवादी व्यक्ति की भोग-लालसाओं की तुलना कृष्ण की पारलौकिक भोग-लालसाओं से नहीं कर सकता। जब तक कोई आध्यात्मिक विज्ञान में उन्नत नहीं होता है, तब तक वह कृष्ण और गोपियों के बीच की भोग-लालसा को नहीं समझ सकता है। चैतन्य चरितामृत में गोपियों की भोग-लालसा की इच्छा की तुलना सोने से की जाती है। दूसरी ओर, एक भौतिकवादी व्यक्ति की भोग-लालसा की इच्छा की तुलना लोहे से की गई है। किसी भी अवस्था में लोहा और सोना समान नहीं हो सकता। जीवित संस्थाएं - चल और स्थिर - कृष्ण का हिस्सा हैं; इसलिए मूल रूप से उनकी उसी तरह की भोग-लालसा है जैसे उनकी। लेकिन जब यह भोग-लालसा पदार्थ के माध्यम से प्रकट होती है, तो यह घृणित होती है। जब एक जीव आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है और भौतिक बंधन से मुक्त होता है, तो वह सच्चाई में कृष्ण को समझ सकता है। जैसा कि भगवद गीता (4.9) में कहा गया है:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन
"जो मेरे स्वरूप और क्रियाओं की पारलौकिक प्रकृति को जानता है, शरीर छोड़ने पर, इस भौतिक दुनिया में फिर से जन्म नहीं लेता है, लेकिन मेरे शाश्वत धाम को प्राप्त करता है, हे अर्जुन।"
जब कोई कृष्ण के शरीर के साथ-साथ भगवान की भोग-लालसा को समझ सकता है, तो वह तुरंत मुक्त हो जाता है। भौतिक शरीर में बंद एक बाध्य आत्मा कृष्ण को समझ नहीं सकता है। जैसा कि भगवद गीता (7.3) में कहा गया है:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये
यतातामपि सिद्धानां कश्चित् माम वेत्ति तत्वतः
"हजारों पुरुषों में से एक पूर्णता के लिए प्रयास कर सकता है, और जो पूर्णता प्राप्त कर चुके हैं, उनमें से शायद ही कोई मुझे सच्चाई में जानता हो।"
सिद्धये शब्द मुक्ति का संकेत देता है। भौतिक स्थिति से मुक्त होने के बाद ही कोई कृष्ण को समझ सकता है। जब कोई कृष्ण को जैसा वह है (तत्त्वत:) समझ सकता है, तो वह वास्तव में आध्यात्मिक दुनिया में रहता है, हालांकि स्पष्ट रूप से भौतिक शरीर के भीतर रहता है। यह तकनीकी विज्ञान तभी समझा जा सकता है जब कोई वास्तव में आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो।
अपने भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.2.187) में, श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं:
इहा यस्य हरर दास्ये कर्मणा मनसा गिरः
निखिलास्वपि अवस्थासु जीवन-मुक्तः स उच्यते
जब इस भौतिक दुनिया में एक व्यक्ति केवल प्रेम और भक्ति के साथ कृष्ण की सेवा करना चाहता है, तो वह मुक्त हो जाता है, भले ही इस भौतिक दुनिया के भीतर कार्य कर रहा हो। जैसा कि भगवद गीता (14.26) पुष्टि करती है:
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान् समतीत्यैतान ब्रह्म-भूयाय कल्पते
"जो सभी परिस्थितियों में पूर्ण भक्ति सेवा में संलग्न रहता है, वह तुरंत भौतिक प्रकृति के गुणों से ऊपर उठ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर पर आता है।"
केवल भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न होकर ही कोई मुक्ति प्राप्त कर सकता है। जैसा कि भगवद गीता (18.54) में कहा गया है, ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति। एक व्यक्ति जो आध्यात्मिक ज्ञान में अत्यधिक उन्नत है और जिसने ब्रह्म-भूत अवस्था प्राप्त कर ली है, वह न तो विलाप करता है और न ही किसी भौतिक चीज की लालसा करता है। यही आध्यात्मिक साक्षात्कार का चरण है।
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ब्रह्म-भूत अवस्था को दो भागों में मानते हैं - स्वरूप-गत और वस्तु-गत। जिसने कृष्ण को सच्चाई में समझ लिया है, लेकिन अभी भी कुछ भौतिक संबंध बनाए हुए है, वह अपने स्वरूप, अपनी मूल चेतना में स्थित माना जाता है। जब वह मूल चेतना पूरी तरह से आध्यात्मिक हो जाती है, तो उसे कृष्ण चेतना कहा जाता है। जो ऐसी चेतना में रहता है वह वास्तव में वृंदावन में रह रहा होता है। वह कहीं भी रह सकता है; भौतिक स्थिति मायने नहीं रखती। जब कृष्ण की कृपा से कोई इस प्रकार उन्नति करता है, तो वह भौतिक शरीर और मन से पूरी तरह से अप्रभावित हो जाता है और उस समय वास्तव में वृंदावन में रहता है। उस अवस्था को वस्तु-गत कहा जाता है।
अनुभव की svarūpa-gata अवस्था में आध्यात्मिक गतिविधियों का अभ्यास करना चाहिए। इसके साथ-साथ साधक को oṁ namo bhagavate vāsudevāya जैसे मन्त्रों का जाप करना चाहिए। cin-mayī Gāyatrī अर्थात् klīṁ kṛṣṇāya govindāya gopījana-vallabhāya svāhā, और klīṁ kāma-devāya vidmahe puṣpa-bāṇāya dhīmahi tan no ’naṅgaḥ pracodayāt इस कामगायत्री मन्त्र या काम-बीज मन्त्रों का जाप भी करना चाहिए। एक निष्ठावान गुरु से दीक्षा लेकर इन दिव्य मन्त्रों से कृष्ण की उपासना करनी चाहिए।
जैसा कि कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने पूर्व और वर्तमान श्लोकों में बताया है:
vṛndāvane ‘aprākṛta navīna madana’
kāma-gāyatrī kāma-bīje yāṅra upāsana
puruṣa, yoṣit, kibā sthāvara-jaṅgama
sarva-cittākarṣaka, sākṣāt manmatha-madana
साधक को जब गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त होती है और साधक शुद्ध हो जाता है तो वह इस मन्त्र का जाप करते हुए साक्षात् भगवान कृष्ण की उपासना करता है। जैसा कि भगवद गीता (18.65) में स्पष्ट किया गया है कि साधकों को कृष्ण, जो कि सबसे आकर्षक हैं, से आकर्षित होने के योग्य बनाने के लिए दिव्य उपासना में व्यस्त रहना चाहिए:
man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru
mām evaiṣyasi satyaṁ te pratijāne priyo ’si me
“तुम सदैव मेरे बारे में सोचते रहना, मेरे भक्त बनना, मेरी पूजा करना और मुझे प्रणाम करना। ऐसा करके तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें वचन देता हूं ऐसा होगा, क्योंकि तुम मेरे बहुत प्यारे दोस्त हो।”
क्योंकि हर जीव भगवान कृष्ण का एक अविभाज्य अंग है, इसलिए कृष्ण स्वाभाविक रूप से आकर्षक हैं। भौतिक शरीर के ढांचे के कारण ही कृष्ण के प्रति आकर्षण रुका हुआ है। आमतौर पर, व्यक्ति भौतिक दुनिया में कृष्ण के प्रति आकर्षित नहीं होते हैं, लेकिन जैसे ही व्यक्ति भौतिक स्थितियों से मुक्त हो जाता है, वह स्वाभाविक रूप से कृष्ण की ओर आकर्षित होता है। इसलिए इस श्लोक में कहा गया है, sarva-cittākarṣaka: “हर कोई स्वाभाविक रूप से कृष्ण की ओर आकर्षित होता है।” यह आकर्षण हर किसी के हृदय में है, और जब हृदय साफ होता है, तो यह आकर्षण प्रकट होता है (ceto-darpaṇa-mārjanaṁ bhava-mahā-dāvāgni-nirvāpaṇam)।
