| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप » श्लोक 130-131 |
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| | | | श्लोक 2.8.130-131  | यद्यपि राय - प्रेमी, महा - भागवते ।
ताँर मन कृष्ण - माया नारे आच्छादिते ॥130॥
तथापि प्रभुर इच्छा - परम प्रबल ।
जानिलेह रायेर मन हैल टलमल ॥131॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री रामानन्द राय भगवान के महान भक्त तथा भगवद् प्रेमी थे, और यद्यपि उनका मन कृष्ण की माया से आच्छादित नहीं हो सका, तथा यद्यपि वे भगवान के मन को समझ सकते थे, जो कि अत्यन्त प्रबल तथा तीव्र था, फिर भी रामानन्द का मन थोड़ा विचलित हो गया। | | | | Sri Ramanand Rai was a great devotee of the Lord and a lover of God and although his mind could never be clouded by the illusion of Krishna and he could understand the firm and serious mind of the Lord, yet Ramanand's mind became somewhat disturbed. | | ✨ ai-generated | | |
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